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"बंसी"

Writer: Archana Anupriya
Archana Anupriya
Aug 12, 2020
1 min read

बांस की एक पतली सी डंडी

कई छेदों के घाव लिए

दर्द में पुकारती है जब

अपने प्रेम परमेश्वर को

साँसें बज उठती हैं उसकी

धुन लहराने लगती है

हवाएँ मचल-मचल उठती हैं

कृष्ण थाम लेते हैं उसे

अपने कोमल हाथों में

लगा लेते हैं अपने अधरों से

और दर्द बदल जाता है

प्यार में, सुकून में, समर्पण में

और वह बांस की कोमल,

साधारण सी दिखने वाली डंडी

कृष्ण के होठों से लगकर

बन जाती है बंसी विश्वास की

थिरकती मुरली प्यार की

जिसकी हर छिद्र से निकलती है

रागिनी,आस्था, राधा, मीरा..

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