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भावों की चयनिका by Archana Anupriya

भावों की चयनिका
- Archana Anupriya
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हमारे कालेज का हौस्टल और परीक्षा की तैयारी”
“हमारे कालेज का हौस्टल और परीक्षा की तैयारी” नीट की परीक्षा,पेपर लीक का सिलसिला, छात्रों का सड़क पर हंगामा और टीवी पर दुनिया भर की डिबेट..अजब सा नजारा हर चैनल पर दिख रहा था। बच्चों की मेहनत पर पेपर लीक का ऐसा कुठाराघात देखकर अफसोस भरा दिल अपने परीक्षा के दिनों को याद करने लगा।याद आने लगी परीक्षा की घड़ियां और वे सारी तैयारियां,जो परीक्षा के दिनों में हम हौस्टल में किया करते थे। हम लड़कियों का हौस्टल और एक्जाम का महीना–ये कॉम्बो किसी वेब सीरीज से कम नहीं था।जैसे ही परीक्षा क
Archana Anupriya
Jun 199 min read


"चांद कुमार के सपने"
"चांद कुमार के सपने" (एक व्यंग्यात्मक कहानी) चांद कुमार का जन्म ही ‘सपना’ देखने के लिए हुआ था। नाम भले चांद था, पर किस्मत धरती पर भी प्लॉट न दिला पाई।चांद कुमार जी जागते हुए सपने देखने में सिद्धहस्त थे।ऐसा कोई किरदार न था, जिसमें खुद को ढालकर चांद कुमार ने आनंद की अनुभूति न की हो।ये जो मेनिफेस्टेशन की अवधारणा चल पड़ी है आजकल की सोशल मीडिया पर, चांद कुमार जी स्वयं को इसके प्रणेता सिद्ध करने में लगे थे।हर दिन कुछ नया सोच लेते और फिर स्वयं को उसमें फिट करने की कोशिश में लग जाते
Archana Anupriya
Jun 144 min read


"जीवन और पर्यावरण"
“जीवन और पर्यावरण” कल्पना कीजिए 2050 की गर्मी…तापमान 52°C से 60डिग्री सेल्सियस..आठ साल का कियान अपने दादू के साथ ‘सिटी सेंट्रल पार्क’ जाता है। बोर्ड पर लिखा था: Welcome to India’s Last Natural Tree — AC Zone Entry ₹500…कियान ने कांच के डोम के अंदर झांका। एक अकेला नीम का पेड़। उसके नीचे दादू बचपन में गिल्ली-डंडा खेलते थे। अब उसके चारों तरफ टिकट काउंटर, सेल्फी पॉइंट और Oxygen Bar था ..10 मिनट सांस लेने के पांच सौ रूपए। कियान पूछता है, "दादू, पेड़ तो फ्री में ऑक्सीजन देते थे न?
Archana Anupriya
Jun 67 min read


"अधिक आस्था तर्कशक्ति को क्षीण कर देती है"
"अधिक आस्था तर्कशक्ति को क्षीण कर देती है" आस्था,विश्वास,भक्ति तथा तर्क, विवेक,ज्ञान- ये सभी एक दूसरे के पूरक विचार हैं।बोलने,समझने और विश्लेषण की प्रक्रिया से गुजरते हुए सभी एक दूसरे से इस तरह से टकराते हैं कि असल अवधारणा कहीं और धरी रह जाती है और हम द्वंद्व और विवाद में फंसकर एक दूसरे पर आक्षेप करने में लग जाते हैं और भटकते रह जाते हैं। दरअसल,आस्था और तर्क विश्वास और विवेक के बीच की पतली रेखा है।तर्क दिमाग के माध्यम से चलता है और आस्था दिल को राह बनाती है। प्रश्न यह उठता
Archana Anupriya
May 307 min read
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