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भावों की चयनिका by Archana Anupriya

भावों की चयनिका
- Archana Anupriya
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"श्रावण मास और शिव तत्व "
“श्रावण मास और शिव तत्व” भारतीय संस्कृति में श्रावण मास का नाम आते ही मन में शिवलिंग पर गिरती जलधारा, मंदिरों में गूंजता “हर हर महादेव”,बेलपत्र और गंगाजल से भरे कलश और सावन की रिमझिम फुहारों की तस्वीरें उभर आती हैं। चारों तरफ हरियाली, पत्तों से टपकती बूंदें,बड़े वृक्षों पर लगे झूले और प्रकृति का खिला अद्भुत सौंदर्य-सबकुछ आंखों के सामने उभर आता है।आखिर सावन को ही भगवान शिव का प्रिय मास क्यों माना गया?इसके पीछे पौराणिक कथा, प्रकृति और भारतीय दर्शन.. तीनों का सुंदर संगम दिखाई दे

Archana Anupriya
Aug 265 min read


"स्वतंत्रता या स्वच्छंदता.. आजादी?"
“स्वतंत्रता या स्वच्छंदता..आजादी?” हाल की कुछ घटनाओं ने समाज को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि स्वतंत्र देश में जो आजादी हम जीने की कोशिश कर रहे हैं वह सही रूप में हमारी स्वतंत्रता है या हमारी स्वच्छंदता..?कपड़ों में, बोलचाल की भाषा में, अमर्यादित व्यवहार में क्या हमारी आजादी झलकती है या हम बेलगाम और स्वच्छंद होने को अपनी आजादी समझ रहे हैं.. बिना यह सोचे कि इस तरह की गैरजिम्मेदार आजादी हमारे समाज के लिए घातक सिद्ध होने वाली है। विद्रोह,आंदोलन, व्यवस्था पर ऊंगली उठाना तो प्रजा

Archana Anupriya
Aug 1516 min read


"डिजिटल अरेस्ट -स्क्रीन पर हथकड़ी"
“डिजिटल अरेस्ट- स्क्रीन पर हथकड़ी” रामदयाल मास्टर जी को रिटायर हुए दो साल हुए थे। पेंशन आती थी और परिवार साथ था।पोते से नयी तकनीक सीखते,दोस्तों से वीडियो कॉल पर चैटिंग करते और तरह-तरह की किताबें पढ़ते थे। जिंदगी सुकून और शांति से कट रही थी। एक दिन सुबह 10 बजे फोन बजा। अनजान नंबर था। रामदयाल जी ने फोन उठाया।उधर से आवाज आई – "हैलो, मैं CBI ऑफिसर संतोष कपूर बोल रहा हूं। रामलाल वर्मा जी हैं आप?" मास्टर जी कुर्सी पर सीधे बैठ गए। "जी..जी.. मैं ही हूं।" "आपके आधार कार्ड से दुबई एक प

Archana Anupriya
Aug 47 min read


हमारे कालेज का हौस्टल और परीक्षा की तैयारी”
“हमारे कालेज का हौस्टल और परीक्षा की तैयारी” नीट की परीक्षा,पेपर लीक का सिलसिला, छात्रों का सड़क पर हंगामा और टीवी पर दुनिया भर की डिबेट..अजब सा नजारा हर चैनल पर दिख रहा था। बच्चों की मेहनत पर पेपर लीक का ऐसा कुठाराघात देखकर अफसोस भरा दिल अपने परीक्षा के दिनों को याद करने लगा।याद आने लगी परीक्षा की घड़ियां और वे सारी तैयारियां,जो परीक्षा के दिनों में हम हौस्टल में किया करते थे। हम लड़कियों का हौस्टल और एक्जाम का महीना–ये कॉम्बो किसी वेब सीरीज से कम नहीं था।जैसे ही परीक्षा क

Archana Anupriya
Jun 199 min read


"चांद कुमार के सपने"
"चांद कुमार के सपने" (एक व्यंग्यात्मक कहानी) चांद कुमार का जन्म ही ‘सपना’ देखने के लिए हुआ था। नाम भले चांद था, पर किस्मत धरती पर भी प्लॉट न दिला पाई।चांद कुमार जी जागते हुए सपने देखने में सिद्धहस्त थे।ऐसा कोई किरदार न था, जिसमें खुद को ढालकर चांद कुमार ने आनंद की अनुभूति न की हो।ये जो मेनिफेस्टेशन की अवधारणा चल पड़ी है आजकल की सोशल मीडिया पर, चांद कुमार जी स्वयं को इसके प्रणेता सिद्ध करने में लगे थे।हर दिन कुछ नया सोच लेते और फिर स्वयं को उसमें फिट करने की कोशिश में लग जाते

Archana Anupriya
Jun 144 min read


"जीवन और पर्यावरण"
“जीवन और पर्यावरण” कल्पना कीजिए 2050 की गर्मी…तापमान 52°C से 60डिग्री सेल्सियस..आठ साल का कियान अपने दादू के साथ ‘सिटी सेंट्रल पार्क’ जाता है। बोर्ड पर लिखा था: Welcome to India’s Last Natural Tree — AC Zone Entry ₹500…कियान ने कांच के डोम के अंदर झांका। एक अकेला नीम का पेड़। उसके नीचे दादू बचपन में गिल्ली-डंडा खेलते थे। अब उसके चारों तरफ टिकट काउंटर, सेल्फी पॉइंट और Oxygen Bar था ..10 मिनट सांस लेने के पांच सौ रूपए। कियान पूछता है, "दादू, पेड़ तो फ्री में ऑक्सीजन देते थे न?

Archana Anupriya
Jun 67 min read


"अधिक आस्था तर्कशक्ति को क्षीण कर देती है"
"अधिक आस्था तर्कशक्ति को क्षीण कर देती है" आस्था,विश्वास,भक्ति तथा तर्क, विवेक,ज्ञान- ये सभी एक दूसरे के पूरक विचार हैं।बोलने,समझने और विश्लेषण की प्रक्रिया से गुजरते हुए सभी एक दूसरे से इस तरह से टकराते हैं कि असल अवधारणा कहीं और धरी रह जाती है और हम द्वंद्व और विवाद में फंसकर एक दूसरे पर आक्षेप करने में लग जाते हैं और भटकते रह जाते हैं। दरअसल,आस्था और तर्क विश्वास और विवेक के बीच की पतली रेखा है।तर्क दिमाग के माध्यम से चलता है और आस्था दिल को राह बनाती है। प्रश्न यह उठता

Archana Anupriya
May 307 min read


"हिंग्लिश का दौर है ब्रो.."
“हिंग्लिश का दौर है ब्रो..” आजकल अक्सर लोगों को, विशेषकर नयी पीढ़ी को कहते सुना जाता है..”हे ब्रो,चिल करो यार..हे सिस, तेरे एक्जाम की प्रीपेयरेशन कैसी चल रही है..वगैरह वगैरह..एक पंक्ति में हिंदी और अंग्रेजी..दोनो मिक्स..कुछ अजीब सा ही रूप लेकर बोली जा रही है आज की बोलचाल की भाषा। भाषाओं की खिचड़ी सी बन गयी है,पर मजे की बात है कि सभी बोल रहे हैं,समझ रहे हैं और एक नयी भाषा का गढ़न तेजी से हो रहा है।सच कहें तो कोई भी भाषा कभी स्थिर नहीं रहती। वो नदी की तरह बहती है और रास्ते में

Archana Anupriya
May 218 min read


"रोपाई से विदाई तक: धान भी बदले घर,बेटी भी"
“रोपाई से विदाई तक: धान भी बदले घर, बेटी भी” “बेटी और धान, दोनों ही लक्ष्मी हैं, दोनों ही सृष्टि का आधार हैं और दोनों की किस्मत लगभग एक सी है – जन्म एक जगह, जीवन दूसरी जगह”--यह कथन पुरबिया किसान जगेसर काका की है। सुनने में अजीब जरूर लगता है लेकिन उनकी बात सचमुच पते की है। धान का बीज जहां डाला जाता है, पौधा उगने पर उसे वहीं नहीं रहने दिया जाता। उखाड़कर नए खेत में रोप दिया जाता है। बेटी भी जिस घर में जन्म लेती है, ब्याह के बाद उसे नया घर बसाना पड़ता है। दोनों का घर बदलता है, प

Archana Anupriya
May 165 min read
"मदर्स-डे स्पेशल.."मां की हथेली"
"मदर्स डे स्पेशल: "माँ की हथेली" सुबह छः बजे अनन्या की फ्लाइट थी..दिल्ली से बैंगलोर। हाथ में बोर्डिंग पास, दिल में धुकधुकी। माँ ने रात 3 बजे उठकर पराठे बना दिए थे.. "फ्लाइट में क्या खाएगी, बाहर का मत खाना।" अनन्या झुंझला गई थी, "माँ, मैं 28 की हूँ। एयरपोर्ट पर कैफे है।" माँ बस मुस्कुरा दी। टिफिन में पराठे, आम का अचार और गुड़ का टुकड़ा — "मीठा खाकर जाना, सफर अच्छा जाता है।" एयरपोर्ट पर माँ ने उसे गले लगाया। अनन्या को लगा माँ कुछ कमजोर हो गई हैं। कंधे थोड़े झुक गए हैं। पर माँ

Archana Anupriya
May 103 min read
डायरी प्रियामन की..
कहीं रंग कहीं जंग कहीं ग्रहण दबंग क्या अजीब नजारा बन गया है जहान में.. कहीं बातें कहीं घातें कहीं रंग भरी रातें क्यों सितारों की जगह शोले दिखें आसमान में.. कहीं डर कहीं क्षर कहीं जल रहे घर क्यों हीनता संवेदना की भरी इंसान में ? ©अर्चना अनुप्रिया

Archana Anupriya
Mar 21 min read


"लुप्त होती धार्मिक परंपराएं"
“लुप्त होती धार्मिक परंपराएं” बदलते समय ने केवल समाज की व्यवस्था ही नहीं बदली है बल्कि, युगों से चले आ रहे धार्मिक रीति रिवाज और परंपराओं में भी बदलाव किया है। आजकल सनातन संस्कृति की चर्चा तो देश में जोर-शोर से हो रही है परंतु, सनातन संस्कृति के प्रतीक,धार्मिक रीति रिवाज और परंपराएं घटती जा रही हैं।सनातन के धार्मिक व्यवहार किसी विशेष पंथ से जुड़े नहीं हैं बल्कि ये मानव जीवन को बेहतर और संतुलित बनाने की प्रक्रिया हैं।यह वह रास्ता है,जो मानव जीवन के लिए हमेशा से जरुरी है और ह

Archana Anupriya
Feb 59 min read
"वकालत में महिलायें"
“भारतीय वकालत के क्षेत्र में स्त्रियों की भूमिका” भारतीय न्याय व्यवस्था देश के लोकतांत्रिक ढांचे की रीढ़ मानी जाती है, और इस व्यवस्था को मजबूत बनाने में महिलाओं की भूमिका आज अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली बन चुकी है। एक समय था जब कानून और अदालतें पुरुष-प्रधान क्षेत्र मानी जाती थीं, लेकिन आज महिलाएँ न केवल इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं, बल्कि नेतृत्व, संवेदनशीलता और नारीसुलभ दृष्टिकोण के साथ इसे अधिक मानवीय और संतुलित भी बना रही हैं। भारत में महिलाओं की वकालत

Archana Anupriya
Jan 65 min read
"बदल रहा है समय"
“बदल रहा है समय..” बदलाव प्रकृति का नियम है और समय के साथ बदलना जरूरी भी है।चीजें बदलती रहती हैं.. और बदलना अच्छा भी है क्योंकि समय के साथ चलना जरूरी है।अगर पीछे छूट गये तो या तो पीड़ा होगी या पीड़ा देने लग जायेंगे।भगवान ने भी इस बात पर जोर दिया है कि समय के लिए ,धर्म के लिए,अपने कर्म के लिए बदलना ही चाहिए।खुद भगवान भी अलग-अलग युग में रूप बदल-बदलकर आये। समय के हिसाब से ही ईश्वर भी अपने अवतार में बदलाव करके आये।त्रेतायुगीन अवतार में राक्षसों द्वारा फैलायी अव्यवस्था को दूर करने क

Archana Anupriya
Jan 16 min read
"ढाई अक्षर प्रेम के"
“ढाई अक्षर प्रेम के” अबकी श्रावण मास ने आते ही प्रेम के गुलाब बरसाये…पंखुड़ियां अभी भी मेरी रूह से चिपकी महक रही हैं।भोले बाबा ने इस...

Archana Anupriya
Aug 18, 20256 min read
"रक्षाबंधन"
"रक्षाबंधन" पूरे शहर में कर्फ्यू लगा था। सारी दुकानें बंद, स्कूल कॉलेज बंद... अजीब से हालात थे...यहाँ तक कि मंदिर-मस्जिद भी जाने की किसी...

Archana Anupriya
Aug 9, 20252 min read
"रोष प्रकृति का,दोष मनोवृत्ति का"
“रोष प्रकृति का,दोष मनुवृत्ति का” अभी उत्तराखंड के समाचार देखना शुरू ही किया था कि विज्ञापन आ गया।मन क्षुब्ध हो गया। फिर गूगल पर पढ़ना...

Archana Anupriya
Aug 8, 20254 min read
"युवा पीढ़ी के भटकाव को रोक सकते हैं स्वामी विवेकानंद जी के विचार"
“ युवा पीढ़ी के भटकाव को रोक सकते हैं स्वामी विवेकानंद जी के विचार” आज दुनिया के हर माता-पिता को इस बात से शिकायत है कि उनके बच्चे उनकी...

Archana Anupriya
Jul 3, 20257 min read
"जंगल की संसद"
"जंगल की संसद" वन की संसद का अधिवेशन था कई झमेलों का इमरजेंसी सेशन था सारे पशु पक्षियों का मानो लगा हुआ था मेला... हर एक अपनी शिकायतों ...

Archana Anupriya
Jun 27, 20253 min read
डायरी मन की--"हादसा? लापरवाही?साजिश?बदला?या संतुलन?"
हादसा? लापरवाही?साजिश? बदला?या संतुलन? आये दिन जो कुछ भी अच्छा या बुरा घटित होता है उसके पीछे मनुष्यों के कर्म उत्तरदायी हैं या ईश्वर की...

Archana Anupriya
Jun 14, 20254 min read
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