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"जीने का सार...अपनाना या जानना"

  • Writer: Archana Anupriya
    Archana Anupriya
  • Jul 28, 2020
  • 2 min read

किसी चीज को अपनाना और उसे जानना--दो अलग-अलग बातें हैं। जब हम किसी चीज को अपनाते हैं तो..बस अपनाते हैं।उसकीअच्छाइयाँ,बुराइयाँ,कीमत,उसके उपयोग वगैरह कुछ भी नहीं देखते। उसके लिए किसी भी तरह का कोई भी तर्क दिमाग में नहीं आता,बस वो चीज हमारी हो जाती हैऔर हम उसका अच्छा और भला चाहते हैं….उसे पाकर आनंदित होते हैं।

लेकिन, जब हम किसी को जानने की कोशिश करते हैं तो तर्क ही प्रमुख आधार होता है। हम उस चीज को और उसके व्यक्तित्व को काट-छांट कर उसे अंदर-बाहर हर तरफ से तार्किक ढंग से जानने और समझने की कोशिश करते हैं….क्या है, क्यों है..कैसे है..बदल दें तो कैसा रहे वगैरह वगैरह...।उदाहरण के तौर पर अगर हम बचपन क्या है,क्यों है,कैसा होना चाहिए--ये समझने लगें तो अल्हड़ मदमस्त बचपन गँवा बैठेंगे।एक भंवरा संपूर्ण रूप से फूल का आनंद लेता है,भले ही वह फूल के विषय में कुछ भी नहीं जानता,लेकिन कोई वैज्ञानिक जो उस फूल को जानता है, उसके हर भाग पर ज्ञान अर्जित करना चाहता है, उसे तोड़कर हर भाग का परीक्षण करता है... वह उस फूल की सम्पूर्णता का वो आनंद नहीं ले पाता जो फूल की खुशबू और उसकी सुंदरता से भंवरा मंडराकर या फूल के सानिध्य में रहने वाले कीड़े मकोड़े ले लेते हैं।

आज की दुनिया में हम सभी खुद को ज्ञानी और तार्किक बनाना चाहते हैं।इसीलिए घर, परिवार, रिश्ते- हर चीज को जानने और समझने के लिए उसके हर पहलू को तोड़ मरोड़ कर तर्क पूर्ण तरीके से देखने लगे हैं।यही कारण है कि हम उसकी संपूर्णता का आनंद नहीं ले पाते वरन् उसे काट छांट कर समझने की कोशिश में अच्छाई-बुराई ढ़ूँढ़ते रह जाते हैं और जीवन समाप्त हो जाता है।

देखा जाए तो जानने की कोई सीमा नहीं होती।

हम एक पहलू को जान पायें तब तक कोई दूसरा पहलू हमें नजर आने लगेगा, हम फिर उस पर शोध करेंगे, तो फिर तीसरा... फिर चौथा..

और इस तरह अनंत पहलुओं पर शोध ही करते रह जाएंगे….. उसका वो आनंद नहीं उठा पाएंगे, जिसके लिए प्रकृति ने उसका निर्माण किया है।आखिर प्रकृति से बड़ा वैज्ञानिक और दार्शनिक कौन है भला..?

बेहतर यह होगा कि प्रकृति ने हमें जो कुछ भी जिस रूप में दिया है उसे हम उसी रूप में अपना लें... ज्यादा जानने की कोशिश में समय न गवाएं..बल्कि उसका आनंद उठाएँ न कि उसपर तर्कों से बँधकर अपनी जिंदगी तमाम कर लें…. फिर चाहे वह फूल-पत्ती हो या रिश्ते..।

अर्चना अनुप्रिया।

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