"लुप्त होती धार्मिक परंपराएं"
- Archana Anupriya

- 20 hours ago
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“लुप्त होती धार्मिक परंपराएं”
बदलते समय ने केवल समाज की व्यवस्था ही नहीं बदली है बल्कि, युगों से चले आ रहे धार्मिक रीति रिवाज और परंपराओं में भी बदलाव किया है। आजकल सनातन संस्कृति की चर्चा तो देश में जोर-शोर से हो रही है परंतु, सनातन संस्कृति के प्रतीक,धार्मिक रीति रिवाज और परंपराएं घटती जा रही हैं।सनातन के धार्मिक व्यवहार किसी विशेष पंथ से जुड़े नहीं हैं बल्कि ये मानव जीवन को बेहतर और संतुलित बनाने की प्रक्रिया हैं।यह वह रास्ता है,जो मानव जीवन के लिए हमेशा से जरुरी है और हमेशा ही रहेगा अर्थात शाश्वत रहने वाले धर्म या कर्म, जिनका न कोई आदि है न अंत है.. जो सदा से मानव जीवन में शामिल थे और सदा ही शामिल रहेंगे। कहने का तात्पर्य है कि जब तक मानव जीवन है,ये व्यवहार अनिवार्य हैं, भले इनका स्वरूप बदलता रहे या पंथ, क्षेत्र,प्रांत के अनुसार व्यवहार में परिवर्तन आता रहे।ये व्यवहार जीवन जीने के सिद्धांतों और नियमों को संदर्भित करते हैं।जीवन को संतुलित रखने के लिए जरूरी है कि अन्य कार्यों के साथ-साथ मानव सर्वोत्तम शक्ति, ईश्वरीय शक्ति से जुड़ा रहे ताकि मानव जीवन संतुलित और पवित्र रूप से चल सके,हमारी चेतना उन्नति की ओर बढ़ सके और मानव का आध्यात्मिक विकास होता रहे।ये धार्मिक रीति रिवाज जीवन के महत्वपूर्ण पलों,जैसे जन्म, विवाह, मृत्यु आदि से जुड़े रहते हैं और दैनिक जीवन में अन्य कार्यों के अतिरिक्त पूजा,त्यौहार जैसे प्रसंगों में अपनाये जाते हैं।परमार्थिक कार्य में व्यक्ति के जीवन के निर्वाह की बात होती है और धार्मिक कार्य में व्यक्ति के जीवन के निर्वाण की बात होती है अर्थात् सर्वोच्च शक्ति से जुड़ने और जुड़े रहने की बात होती है।ये धार्मिक रीति-रिवाज किसी भी धर्म के मानने वालों द्वारा अपनायी जाने वाली प्रथाएं और परंपराएं हैं, जो जीवन के महत्वपूर्ण पलों जैसे,जन्म, विवाह, मृत्यु)और दैनिक जीवन (पूजा, त्योहार) में अपनायी जाती हैं,जैसे हिंदू धर्म में नामकरण, मुंडन, दैनिक पूजा-पाठ,इस्लाम में ईद, रोज़ा, नमाज़; और सिख धर्म में गुरु पर्व, बैसाखी, लंगर आदि।ये सभी विश्वासों और संस्कृतियों को दर्शाते हैं। हिंदू संस्कृति में गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक 16 मुख्य संस्कार (जैसे नामकरण, मुंडन, विवाह, यज्ञोपवीत आदि) होते हैं।इसके अतिरिक्त प्रतिदिन घर पर दीप जलाना, मंत्रोच्चार, योग, ध्यान, और प्रसाद ग्रहण करना आदि भी इन व्यवहारों में शामिल हैं।तिलक लगाने से एकाग्रता बढ़ती है, दक्षिण दिशा में सिर करके न सोने के पीछे वैज्ञानिक कारण हैं,और प्राणायाम तनाव कम करता है।इन सभी व्यवहारों को हमेशा से ही अपनाया और बताया जाता रहा है।इस्लाम में जैसे रोज़ा (उपवास), नमाज़ (प्रार्थना), और ईद जैसे त्योहार का मनाना शामिल है।गुरु पर्व, बैसाखी, और लंगर (सामुदायिक भोजन) जैसी परंपराएं हैं, जो पंजाब में अधिक प्रचलित हैं।इन सभी धार्मिक व्यवहारों का वैज्ञानिक उद्देश्य होता है।ये दुःख में सांत्वना और मार्गदर्शन देते हैं।ये व्यक्तिगत पसंद और सांस्कृतिक मानदंडों पर आधारित होते हैं।ये धर्म के सिद्धांतों जैसे सत्य,अहिंसा को दर्शाते हैं। यह अलग बात है कि इनमें क्षेत्रीय विविधताएं होती हैं,रीति-रिवाज धर्म के भीतर भी क्षेत्र, गांव और परिवारों के अनुसार अलग-अलग होते हैं, जैसे दक्षिण भारत में मंदिर वास्तुकला और केरल में ओणम परन्तु ,किसी भी समाज या समूह में लंबे समय से चले आ रहे ये पारंपरिक तरीके, प्रथाएं और संस्कार सामाजिक रूप से स्वीकृत व्यवहार को परिभाषित करते हैं।ये जीवन की घटनाओं, त्योहारों और दैनिक जीवन से जुड़े होते हैं और इनका पालन पीढ़ियों से किया जाता है,जो नैतिक विश्वासों और सामाजिक नियमों पर आधारित होते हैं।
पहले के दिनों में कई तरह के दैनिक व्यवहार हर घर में स्वयं को ईश्वरीय शक्ति से जुड़ाव बनाये रखने के लिए आवश्यक रूप से किये जाते थे, उदाहरण के लिए सुबह बिना नहाये गृहिणियां रसोई में नहीं जाती थीं,भोजन पहले अग्नि को आहुति स्वरूप दिया जाता था, फिर घर के भगवान का भोग निकाला जाता था,उसके पश्चात ही घर के सदस्य भोजन करते थे।इसके अतिरिक्त, संध्या गोधूलि वेला होते ही घर में दीपक जलाया जाता था, भगवान की आरती की जाती थी और तुलसी के आगे दीप रखा जाता था।हर एकादशी पर व्रत रखना, पूर्णिमा पर सत्यनारायण की कथा करना त्योहार पर नये कपड़े बनवाना,दान दक्षिणा देना जैसे अनेक व्यवहार थे,जिनका हर कोई पालन करता था।पर्व-त्योहार पर घर में विशेष पकवान बनाना,विशेष पूजा-अर्चना करना अवश्यंभावी माना जाता था। कुछ परम्परायें जैसे अमुक दिन बाल या नाखून नहीं काटना,अमुक दिन खट्टा नहीं खाना आदि भी लोक व्यवहार में पूरी तरह से शामिल थे।भोजन की शुद्धता पर जोर दिया जाता था,उपवास रखा जाता था, जैसे कि शुक्रवारी को संतोषी माता की कथा, रविवार का उपवास,बड़का इतवार,मंगलवार, पूर्णिमा,एकादशी, सतुवान,नए अनाज के पहले का पर्व आदि कितनी भी छोटी -बड़ी धार्मिक परंपराएं थीं,जो लगभग हर महीने की जाती थीं।आज ऐसे व्यवहार दकियानूसी करार दिये जाते हैं और दैनिक जीवन से निकलते जा रहे हैं।आधुनिक जीवनशैली और काम के बोझ के कारण लोगों के पास वैदिक परंपराओं को समझने और ठीक से पूजा करने का समय नहीं है।भौतिकवादी सोच अपनाने के कारण लोग धन,नौकरी या अन्य इच्छाओं की पूर्ति के लिए पूजा करने लगे हैं,न कि आत्मिक शांति या भक्ति के लिए।लोग अब यह मानने लगे हैं कि पूजा का अत्यधिक या अंधविश्वासी तरीके से करना या केवल भाग्य पर निर्भर रहना संतुलन बिगाड़ता है और वास्तविक लाभ नहीं देता। ऐसी सोच और भारतीय संस्कृति और पूर्वजों की परंपराओं से दूर होने के कारण धार्मिक अनुष्ठानों का महत्व भी कम हो रहा है।आज लोगों में तनाव और मन का भटकाव बढ़ने के कारण पूजा में उनका मन नहीं लगता, जिससे लाभ नहीं मिलता और लोग पूजा से दूर होने लगते हैं।मन की साधना में कमी आने लगी है और मन को शांत करने और एकाग्रता बढ़ाने के लिए ध्यान और सही धार्मिक यात्रा (सत्संग) की कमी भी एक कारण है कि लोग ऐसे व्यवहार नहीं अपना रहे।
आजकल लुप्त होते पूजा-पाठ के मुख्य कारण आधुनिकीकरण,व्यस्त जीवनशैली, और परंपराओं से दूरी हैं, जिससे लोग धन या नौकरी जैसे भौतिक लाभों के लिए जल्दी-जल्दी पूजा करते हैं,वहीं दूसरी ओर अंधविश्वास और अत्यधिक अपेक्षाएँ भी पूजा के मूल उद्देश्य,आत्मिक शांति से भटकाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप मन की एकाग्रता और सही विधि का अभाव होता है,और लोग धार्मिक परंपराओं से कटते जा रहे हैं। नौकरी-पेशा और आधुनिक जीवन की भागदौड़ ने लोगों को इतना व्यस्त कर दिया है कि उनके पास व्रत-पूजा या कथा सुनने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं होता।मोबाइल फोन, इंटरनेट और ओ टीटी प्लेटफॉर्म्स ने मनोरंजन के नए साधन दे दिए हैं,जो ज्यादा आकर्षक और तुरंत संतुष्टि देने वाले होते हैं,जिससे पारंपरिक भजनों और कथाओं की जगह अब डिजिटल प्रक्रियाएं ले रहीं हैं।कई बार लोग पंडित बुलाने की जगह मोबाइल पर ही मंत्रोचार लगाकर डिजिटल विधि से व्यवहार कर लेते हैं।त्योहारों और धार्मिक आयोजनों पर होने वाले खर्चों से आम आदमी पर वित्तीय बोझ बढ़ता है, जिससे कई लोग इन्हें सीमित कर देते हैं।शहरों में संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवार बन गये हैं, जिससे परंपराओं को आगे बढ़ाने और सामूहिक धार्मिक आयोजनों का माहौल कम हो गया है।लोग तात्कालिक सुख और भौतिक इच्छाओं की पूर्ति पर ज्यादा ध्यान देने लगे हैं, जिससे निःस्वार्थ भक्ति या आध्यात्मिक साधना में रुचि कम हो रही है। बच्चों को बचपन से धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं का सही ज्ञान नहीं मिल पा रहा है,जिसकी वजह से उनका जुड़ाव इन व्यवहारों से कमजोर हो गया है और वे इनका पालन नहीं कर पा रहे हैं। भक्ति के स्वरूप में बदलाव आ गया है,पारंपरिक भजनों की जगह अब आधुनिक और तेज संगीत वाले भजन या फिल्मी गाने आ रहे हैं, जो युवाओं को आकर्षित तो करते हैं, लेकिन भक्ति की गहराई को कम कर देते हैं।कई बार भक्ति स्वार्थ-सिद्धि या मनोकामना पूर्ति तक ही सीमित रह जाती है, जो लंबी अवधि में रुचि कम करती है,जबकि सच्ची भक्ति निःस्वार्थ भाव से होती है। देखा जाए तो, पूजा-पाठ का लुप्त होना आधुनिक जीवन की चुनौतियों और आध्यात्मिक समझ की कमी का परिणाम है, जिसे सही ज्ञान, एकाग्रता और निष्ठा से सुधारा जा सकता है।पूजा-पाठ के ये व्यवहार एक उच्च स्तरीय संस्कार देते हैं,दुखों को दूर करने का एक माध्यम हैं,लेकिन इनका उद्देश्य आत्मिक शांति और ईश्वर से जुड़ाव होना चाहिए, न कि सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति।जब पूजा भावनाओं की शुद्धि और आंतरिक बदलाव के साथ की जाती है,तब वह व्यक्ति को सुखी करती है, न कि दुखी। आजकल व्रत, कथा और भजन कम होने के मुख्य कारण जीवनशैली में बढ़ती व्यस्तता, महंगाई, मनोरंजन के नए विकल्प,जैसे, डिजिटल मीडिया और आध्यात्मिक जुड़ाव की कमी हैं,जहाँ लोग भौतिक सुखों और तात्कालिक संतुष्टि को ज़्यादा महत्व दे रहे हैं। इस वजह से पारंपरिक धार्मिक गतिविधियों में समय और मन लगाना मुश्किल हो गया है, साथ ही नई पीढ़ी को इनमें पहले जैसा रोमांच नहीं मिलता और इसीलिए वे दिलचस्पी भी नहीं लेते।आधुनिक जीवनशैली, तकनीकी प्रभाव और बदलते सामाजिक मूल्यों ने व्रत, कथा, भजन जैसी पारंपरिक धार्मिक गतिविधियों के प्रति लोगों के रुझान को कम कर दिया है, हालांकि आज भी बहुत से लोग आस्था और परंपरा का पालन कर रहे हैं, लेकिन पहले जैसा व्यापक उत्साह नहीं रहा है। परिणामस्वरूप,आत्मिक शांति का अभाव दिखाई देने लगा है।जब पूजा का उद्देश्य भटक जाता है, तो मन को शांति नहीं मिलती और लोग अशांत से दिखने लग जाते हैं, बात बात पर तैश में आ जाना,अत्यधिक संवेदनशील होकर गलत कदम उठाना, दूसरों के प्रति संवेदनहीन रहना- ये सब लक्षण संस्कारों से दूर होने के ही परिणाम हैं।।धीरे-धीरे धार्मिक और सांस्कृतिक संस्कार कमजोर पड़ते जा रहे हैं। अक्सर जल्दबाजी और अज्ञानता के कारण पूजा-पाठ के कर्मकांड अधूरे या गलत हो जाते हैं।
समाधान…
अब प्रश्न है कि इन्हें बनाये रखने के लिए क्या करें ताकि आने वाली पीढ़ियां इन व्यवहारों को सकारात्मक रूप से अपनायें। इसके लिए जरूरी है कि सही व्यवहार को अपनाया जाये और तार्किक रूप से नयी पीढ़ी को भी प्रेषित की जा सके।शास्त्र विधि से पूजा करने के लिए सही स्थान और समय का चुनाव भी जरूरी है।एकाग्रता और ध्यान मन को सही दिशा देते हैं।सुबह ध्यान करने से मन शांत होता है और एकाग्रता बढ़ती है।पूजा पाठ संबंधित से व्यवहार को दुखों से भागने का माध्यम नहीं बनाएं बल्कि विवेक और संतुलन के साथ करें ताकि विपरीत परिस्थितियों में स्वयं को स्थिर और संतुलित रख सकें।ये सब नयी पीढ़ी तक प्रेषित करना आवश्यक है।निष्ठा भाव से धार्मिक कार्य करके भगवान से मांगने की बजाय भगवान को पाने का भाव रखा जाये जैसे गोपियों ने किया था तो न केवल मन संतुष्ट और संतुलित रहेगा बल्कि आध्यात्मिक विकास भी होगा। सच्चे सत्संग और मार्गदर्शन भी हमारे व्यवहार को सही दिशा देते हैं। इसीलिए धार्मिक यात्रा में अपने से ज्ञानी लोगों का साथ लिया जाना चाहिए ताकि सही मार्गदर्शन प्राप्त हो।पूजा के बाद प्रशाद वितरण,एक दूसरे के घर बैठना भेजना,घर जाकर लोगों से मिलना-जुलना,लोहड़ी या होलिका दहन जैसे व्यवहारों पर इकट्ठे होकर त्योहार मनाना जैसे व्यवहार सामाजिक एकता को भी बढ़ावा देते हैं, जिससे सामाजिक तौर पर लोगों में आत्मसंतुष्टि बढ़ती है और भावनाओं में समृद्धि होती है।संक्षेप में कहें तो पूजा-पाठ संबंधी व्यवहारों का लुप्त होना आधुनिक जीवन की चुनौतियों और आध्यात्मिक समझ की कमी का परिणाम है, जिसे सही ज्ञान, एकाग्रता और निष्ठा से सुधारा जा सकता है। ये धार्मिक रीति-रिवाज वे सामाजिक आदतें और प्रथाएँ हैं जो किसी संस्कृति के आचरण और जीवनशैली को दर्शाती हैं। हिन्दू धर्म में प्राकृतिक जीवन तथा समाज में प्राणी मात्र के कल्याण पर विशेष बल दिया जाता है। किन्तु इन भावात्मिक शब्दों को क्रियात्मिक रूप देना हर किसी की योग्यता के बस की बात नहीं। जब तक कोई गतिविधि दिखाई न पड़े, कोई भी भावनात्मिक तथा दार्शनिक काम जन साधारण की कल्पना से बाहर रहता है। भावनाओं को साकार करने का कार्य में ही धार्मिक रीति रिवाज करते हैं। रीति रिवाजों का अस्तित्व भोजन में मसालों की तरह का है। जिनके बिना जीवन ही नीरस और फीका हो जायेगा।किन्तु जब ये धार्मिक व्यवहार क्रिया का यथार्थ लक्ष्य छोड़कर केवल दिखावा बन जाते हैं या समय और साधनों की सामर्थ्य से बाहर निकल जाते हैं तो वे बोझ बनने लग जाते हैं।विश्व में कहीं भी कोई मानव समाज ऐसा नहीं है जहाँ लोगों ने धार्मिक परंपराओं को छोड़कर केवल भावनात्मिक क्रियाओं के सहारे जीवन व्यतीत किया हो। हां,समय के अनुसार उनका रूप बदला है और बहुत सी कुरीतियों को व्यवहार से बाहर कर दिया गया है।प्रथा तथा रीति रिवाज समय और समाज की ज़रूरत के अनुसार बदलते रहते हैं। पहले साधक प्रातः ब्रह्म महूर्त में या सूर्योदय के समय, दोपहर, तथा सूर्यास्त के समय लगभग अनिवार्य तौर से ध्यान लगा कर किसी नललं किसी मंत्र का जाप करते थे, या मूर्तियों की पूजा अर्चना तथा आरती करते थे, हवन आदि करते थे। समय के अभाव के कारण आज कल ये प्रथायें या तो लुप्त हो चुकी हैं या संशोधित करके संक्षिप्त रूप में की जाती हैं। किसी भी प्रथा या रीति रिवाज को जब मन और श्रद्धा से किया जाये तो वे अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने में सहायक होती हैं। साधक आसानी से अपने को मनवाँछित दिशा में केन्द्रित कर सकता है तथा दैनिक गतिविधियों से अपने आप को अलग कर के ईश्वरीय शक्ति का आभास महसूस कर सकता है। यह मनोवैज्ञानिक क्रिया है।पूजा अर्चना के रीति रिवाजों में दो तरह के नित्य-नियम हैं, जिन्हें दैनिक नित्य-नियम और घटना प्रधान विधान कह सकते हैं । दैनिक नित्य-नियमके विधान निजि सान्त्वना के लिये होते हैं। घटना प्रधान विधान किसी विशेष घटना के घटित होने के घटित होने पर किये जाते हैं।रीति रिवाजों का प्रावधान सभी मानव समाजों में तथा धर्मों में किसी ना किसी रूप में या तो किया जा रहा है,या उसका स्वरूप बदल दिया गया है या फिर समय और तर्कों के अभाव में भुला दिये गये हैं। थोड़ा बहुत अन्तर स्थानीय भूगौलिक, आर्थिक तथा राजनैतिक कारणों से भी है। हमारे ये धार्मिक रीति रिवाज सरल,आसान तथा परिवर्तनशील हैं। उन्हें समय तथा आवश्यक्तानुसार बदला जा सकता है। समाज हित में इन धार्मिक व्यवहारों को बदलने की क्रिया सर्वसम्मति अथवा बहुसम्मति से होनी चाहिये, व्यक्तिगत सुविधा के लिये नहीं।देखा जाये तो ये छोटे बड़े धार्मिक व्यवहार हमारी संस्कृति का मूल हैं, विभिन्नता में एकता लाने का काम करते हैं और सकारात्मक रूप से ईश्वर के अनुभव को साकार करते हैं।ये हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक व्यवस्था के लिए न केवल आवश्यक हैं, वरन् हमारी आस्था को बढ़ाते हैं और हमारी संस्कृति का गौरव हैं।
अर्चना अनुप्रिया


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