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"मदर्स-डे स्पेशल.."मां की हथेली"

  • Writer: Archana Anupriya
    Archana Anupriya
  • 3 days ago
  • 3 min read

"मदर्स डे स्पेशल: "माँ की हथेली" 


सुबह छः बजे अनन्या की फ्लाइट थी..दिल्ली से बैंगलोर। हाथ में बोर्डिंग पास, दिल में धुकधुकी। 

माँ ने रात 3 बजे उठकर पराठे बना दिए थे.. "फ्लाइट में क्या खाएगी, बाहर का मत खाना।" अनन्या झुंझला गई थी, "माँ, मैं 28 की हूँ। एयरपोर्ट पर कैफे है।" माँ बस मुस्कुरा दी। टिफिन में पराठे, आम का अचार और गुड़ का टुकड़ा — "मीठा खाकर जाना, सफर अच्छा जाता है।"

एयरपोर्ट पर माँ ने उसे गले लगाया। अनन्या को लगा माँ कुछ कमजोर हो गई हैं। कंधे थोड़े झुक गए हैं। पर माँ ने उसके माथे पर हाथ रखा, वही पुराना स्पर्श। "फोन करना पहुंचकर।" अनन्या ने हाँ में सिर हिलाया और मुड़ गई। सिक्योरिटी के बाद पीछे देखा। माँ वहीं खड़ी थीं। हाथ हिला रही थीं। अनन्या को याद आया — स्कूल बस तक छोड़ने जाती थीं तो ऐसे ही खड़ी रहती थीं, जब तक बस मोड़ से ओझल न हो जाए। 


दिल्ली में मायका..आज दो वर्षों के पश्चात अनन्या घर आयी थी। वही घर, वही खुशबू पर अनन्या को कुछ अटपटा लग रहा था। बाहरी दुनिया में व्यस्त अनन्या बदलते वक्त के साथ बड़ी होती रही अपने अंदर के हर बदलाव से अनभिज्ञ..

एक सुबह चाय बनाने गई। गैस जलाई, तो फौरन आंच धीमी कर दी। चौंक गई। ये तो माँ करती हैं — "चाय उफनती नहीं, धीरे-धीरे चढ़ती है।" दोपहर को कपड़े तह कर रही थी। पापा की शर्ट का कॉलर अपने आप उल्टा करके, हथेली से दबा दिया। अरे! ये तो माँ की आदत– "कॉलर बैठा न हो तो अच्छा नहीं लगता।" 

शाम को पड़ोस की आंटी आईं। जाते वक्त अनन्या ने फटाक से दरवाजा बंद किया और लंबी सांस ली। फिर हंसी आ गई। माँ भी ऐसे ही करती हैं, "मेहमान के जाने के बाद दो मिनट शांति से बैठना चाहिए।" कामवाली काम खत्म करके जाने लगी तो अचानक उसे रोका..”रुको मधु,तेरे लिए कुछ लायी हूं, बैंगलोर से..” फिर दौड़कर सूट का कपड़ा लाकर उसे पकड़ा दिया।मधु खुश हो गई।वो चली तो गयी पर अनन्या के मन में ख्याल उभरा-हर बार जब मां मेड के लिए बाहर से कुछ लेकर आती तो वो मैं ही थी जो मां को टोकती थी- “हर बार मेड के लिए कुछ लाना जरूरी है क्या, बिगाड़ रही हो तुम उसकी आदत..मन बढ़ जायेगा उसका” और मां हंसकर कहती,”हमारे घर का हिस्सा है वो,उसके लिए हम सब नहीं करेंगे तो और कौन करेगा”..आज मधु के लिए अनन्या भी सूट का कपड़ा लायी थी।उसकी हर बात में मां की आदत उतर रही थी।

रात को आईने के सामने अनन्या कंघी कर रही थी। बालों में उंगली फंसी तो माथे पर शिकन आ गई। उसी पल आईने में देखा — ये शिकन तो हूबहू माँ जैसी। अनन्या के हाथ रुक गए। 

न जाने कब, कहाँ से उतर आयी है मेरी माँ, मेरी काया के अंदर... जिस बात पर उन्हें टोकती थी — "माँ, इतना मत सोचो", "माँ, तुम भी पुराने जमाने की हो" — आज अनन्या भी वही सब खुद कर रही थी। 

किचन में गई। माँ तुलसी को पानी दे रही थीं। अनन्या पीछे से जाकर लिपट गई। 

"क्या हुआ?" माँ ने चौंककर पूछा। 

"कुछ नहीं," अनन्या की आवाज भर्रा गई, "बस थैंक्यू।" 

"किस बात का?" 

"मेरे अंदर उतर आने के लिए। मुझे पता ही नहीं चला कब आप मेरी आदत बन गईं हैं।"

माँ हंसीं। हथेली से अनन्या का गाल सहलाया। हथेली खुरदरी थी — सालों गृहस्थी की चक्की पीसते,कपड़े निचोड़ते, बच्चों का, परिवार का ख्याल रखते-रखते। अनन्या की आंखों में आंसू थे,बोली–” मां,आप हमसे दूर मत रहा करो, मैं आपको कभी कहीं जाने नहीं दूंगी।” अनन्या को सहलाती हुई मां बोली,"पगली,"माँ कहीं जाती नहीं है। माँ तो ट्रांसफर होती है।मेरी माँ भी मुझमें उतरी थीं। अब मैं तुझमें। कल तू अपनी बेटी में उतरेगी।" अनन्या ने माँ की हथेली अपने गाल पर रख ली। गर्म थी। जानी-पहचानी थी। घर जैसी थी। उस रात अनन्या ने डायरी में लिखा:  

मदर्स डे पर गिफ्ट क्या दूं?  

माँ को माँ ही तो चाहिए थी। और वो मैं बन रही हूँ…धीरे-धीरे, पता ही नहीं चला।  

_यही सबसे बड़ा गिफ्ट है। उनके लिए भी, मेरे लिए भी।

सच में,माँ कोई दिन नहीं मांगती। वो तो रोज, हर सांस में, हमारी आदतों में जिंदा रहती है।  

इस मदर्स डे, माँ को गले लगाओ और आईने में देखो — शायद वो तुममें मुस्कुरा रही हो। 

दुनिया का इकलौता रिश्ता जो 'एक्सपायर' नहीं होता, 'ट्रांसफर' होता है — पीढ़ी दर पीढ़ी।

                  अर्चना अनुप्रिया 

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1 Comment


Swati Gupta
Swati Gupta
3 days ago

❤️❤️❤️❤️

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