"अधिक आस्था तर्कशक्ति को क्षीण कर देती है"
- Archana Anupriya

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"अधिक आस्था तर्कशक्ति को क्षीण कर देती है"
आस्था,विश्वास,भक्ति तथा तर्क, विवेक,ज्ञान- ये सभी एक दूसरे के पूरक विचार हैं।बोलने,समझने और विश्लेषण की प्रक्रिया से गुजरते हुए सभी एक दूसरे से इस तरह से टकराते हैं कि असल अवधारणा कहीं और धरी रह जाती है और हम द्वंद्व और विवाद में फंसकर एक दूसरे पर आक्षेप करने में लग जाते हैं और भटकते रह जाते हैं। दरअसल,आस्था और तर्क विश्वास और विवेक के बीच की पतली रेखा है।तर्क दिमाग के माध्यम से चलता है और आस्था दिल को राह बनाती है।
प्रश्न यह उठता है कि आस्था इंसान के लिए पंख साबित होती है या बेड़ी बन जाती है?क्या हर बात को तर्क के आधार पर ही माना जाये,जहां प्रमाण साक्षात परिलक्षित हो या ऐसे भी माना जा सकता है? दोनों के बीच के संबंध और अंतर को समझना जरूरी है।
देखा जाए तो,आस्था इंसान का सबसे पुराना सहारा है। जब तूफान आता है, बीमारी घेरती है, या रास्ता नहीं सूझता,तब आस्था ही वो दीपक है, जो इंसान की उम्मीद बुझने नहीं देता।मीरा ने जहर पी लिया क्योंकि कृष्ण पर आस्था थी। गांधी ने लाठी पकड़ी क्योंकि अहिंसा पर आस्था थी। कल्पना चावला अंतरिक्ष में गई क्योंकि विज्ञान और खुद पर आस्था थी।कहने का तात्पर्य है कि आस्था उम्मीद देती है,हिम्मत देती है,टूटने से बचाती है।पर सिक्के का दूसरा पहलू भी है।जब आस्था 'आंख मूंदकर मान लेना' बन जाए या जब वो सवाल पूछने से रोक दे,जब वो कहे "बस मानो, दिमाग मत लगाओ" तब वही आस्था तर्क की दुश्मन बन जाती है।
विश्वास,आस्था जब अंधेपन की हद तक आ जाती है तब सब गड़बड़ी शुरू हो जाती है।
इसे एक उदाहरण से समझिए —
एक गांव में हैजा फैला। डॉक्टर ने कहा, "कुएं का पानी मत पियो,दूषित है।" लेकिन,गांव के पुजारी ने कहा, "ये कुआं 200 साल पुराना है। हमारे पुरखों ने इसे सिद्ध किया था। इसका पानी अमृत है। डॉक्टर की मत सुनो।" लोगों ने आस्था चुनी। तर्क हार गया। कई लोग मरे। यहाँ आस्था ने तर्कशक्ति क्षीण कर दी।
अब दूसरी तरफ से देखें–
न्यूटन के सामने सेब गिरा। उसने आस्था से नहीं कहा, "भगवान की मर्जी है, कुछ भी हो सकता है।" उसने पूछा, "क्यों गिरा? ऊपर क्यों नहीं गया?" इस एक 'क्यों' ने उसे गुरुत्वाकर्षण का नियम दे दिया। अगर न्यूटन सिर्फ आस्था रखते कि,"जो होता है अच्छे के लिए होता है" तो शायद आज भी सभी लोग पेड़ के नीचे बैठकर ईश्वर की कृपा से ही सेब के गिरने का इंतजार कर रहे होते।
देखा जाये तो, आस्था और तर्क दोनों के बीच एक संतुलन का होना जरूरी है।आस्था अकेली खतरनाक है।सिर्फ आस्था हो, तर्क न हो, तो इंसान किसी बाबा के कहने पर जहर पी लेता है, चांद पर दाग ढूंढता है, बीमार बच्चे को अस्पताल की जगह ताबीज पहनाता है। इतिहास गवाह है कि सती प्रथा, बाल विवाह, नरबलि — सब 'आस्था' के नाम पर ही हुए और तर्क ने ही आकर इन्हें रोका। लेकिन, यहां यह भी उल्लेखनीय है कि
तर्क अकेला बंजर है। यदि सिर्फ तर्क हो,आस्था न हो तो जिंदगी गणित के सवाल की तरह उलझन भरी और बोरिंग बन जाती है। फिर हर बात मशीनी होकर संवेदनहीनता से जुड़ने लगेगी। जैसे,माँ की ममता को ऑक्सीटोसिन से,प्रेम को डोपामिन से, शहादत को 'लॉजिकल फायदा' से देखा जाने लगेगा ,जो तनिक भी जायज नहीं है, बल्कि गलत है।तब शायद कोई सैनिक बॉर्डर पर न जाए, कोई माँ रात भर जागे न, कोई मीरा जहर न पिए।
दरअसल,तर्क दिमाग है तो आस्था दिल है और जीवन की गाड़ी दोनों पहियों से चलती है।असली खतरा तब पैदा होता है जब 'अधिक' शब्द जुड़ने लगता है ।अधिक आस्था और अधिक तर्क दोनों ही हानिकारक हैं।दवा भी अधिक हो जाए तो जहर बन जाती है। पानी भी अधिक हो जाए तो डुबो देता है। जब आस्था सवाल पूछने से मना करे तब यह आस्था खतरनाक है।शास्त्र यदि कहे कि चुपचाप मानो,बहस मत करो तो यहाँ आस्था तर्क को मारती है। जब आस्था सबूत मांगने को पाप कहे और कहे कि "विश्वास करो, जांच मत करो" तो ऐसी आस्था अंधी है। जब आस्था दूसरों की तर्कशक्ति को कुचल दे यह कहकर कि"मेरा भगवान सच्चा, तेरा झूठा" तो यहाँ आस्था हिंसा कही जा सकती है।जब कबीर ने कहा था कि
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय,तब वह_
आस्था के खिलाफ नहीं थे बल्कि 'अंधी आस्था' के खिलाफ थे।
तर्क और आस्था एक दूसरे के दुश्मन नहीं,दोस्त हैं।डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम रोज नमाज पढ़ते थे और रॉकेट भी बनाते थे। उन्होंने कहा था,"विज्ञान मुझे बताता है, ‘कैसे’ और आस्था मुझे बताती है, ‘क्यों’।” मतलब कि प्रगति दिल और दिमाग दोनों से होकर जब गुजरती है तभी सिद्ध होती है।
आप बीमार हों तो डॉक्टर के पास जाएं,यह तर्क है और फिर,दवा खाकर भगवान से दुआ करें, यह आस्था है।दोनों साथ हों तो इलाज भी होता है और हिम्मत भी बनी रहती है। पर, अगर आप कहें, "दवा नहीं खाऊंगा, सिर्फ दुआ करूंगा" तो यहां अधिक आस्था ने तर्क को मार दिया। अगर कहें, "दुआ बेकार है, सिर्फ दवा काफी है" तो अधिक तर्क ने उम्मीद मार दी।कहने का मतलब है कि यदि आस्था दीपक है तो तर्क आंख है। जैसे दीपक के बिना आंख अंधेरे में कुछ नहीं देख सकती वैसे ही आंख के बिना दीपक का उजाला भी बेकार है।आप देख ही न पाएं तो ऐसी रोशनी का क्या फायदा?इसलिए जरूरी है कि आस्था रखो,पर आंखें भी खुली रखो।यदि कुछ मानो तो परखकर मानो। इसीलिए सवाल पूछना जरूरी है।जिस धर्म,गुरु,रिवाज से सवाल पूछने पर डर लगे तो समझो वहाँ तर्कशक्ति क्षीण हो रही है।
'क्यों' शब्द जिंदा रखना जरूरी है। बच्चा सबसे ज्यादा 'क्यों' पूछता है, इसीलिए सबसे तेज सीखता है। बड़े होते-होते हम 'क्यों' को मार देते हैं और बस 'मान लो' जिंदा रखते हैं।तभी तो उलझनों से घिरे रहते हैं,अपना दायरा सीमित कर लेते हैं और आपसी बैर को पनपने की जगह देते हैं।
बुद्ध ने कहा था, "अप्प दीपो भव" — अपना दीपक खुद बनो। मतलब,आस्था का दीपक जलाओ, पर तर्क की बाती से..तभी उजाला होगा। इसीलिए,आस्था से हाथ छुड़ाना उचित नहीं,वो हमें इंसान बनाती है लेकिन,तर्क से भी दोस्ती नहीं तोड़नी चाहिए क्योंकि वही हमें जिंदा रखता है। दोनों साथ चलें तो प्रगति सही दिशा में होगी।जिस दिन चांद पर जाने वाला वैज्ञानिक मंदिर में माथा टेकना बंद कर दे,या मंदिर जाने वाला इंसान बीमार बच्चे को अस्पताल ले जाना बंद कर दे,उस दिन हम इंसान नहीं, मशीन या पत्थर बन जाएंगे।जिंदगी न मशीन से चलती है,न पत्थर से। जिंदगी चलती है,दिल की आस्था और दिमाग के तर्क के संतुलन से।
अधिक आस्था तर्क शक्ति को क्षीण कर देती है और अधिक तर्कशक्ति इंसान को संवेदनहीन। आस्था और तर्क के संतुलन पर ही एक विचार सही तरीके से कार्यान्वित किया जा सकता है।
मनुष्य केवल शरीर से नहीं, बल्कि विश्वासों, भावनाओं और विचारों से भी निर्मित होता है। जीवन के कठिन क्षणों में आस्था उसे सहारा देती है, आशा देती है और अंतर्मन में भीतर जीने की शक्ति पैदा करती है। इसलिए आस्था मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण आधार है। लेकिन, जब यही आस्था सीमाओं को पार कर अंधविश्वास में बदल जाती है, तब वह मनुष्य की तर्कशक्ति को धीरे-धीरे कमजोर करने लगती है।
“अधिक आस्था तर्क शक्ति को क्षीण कर देती है”—यह कथन केवल धर्म या पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है। जब व्यक्ति किसी विचार, व्यक्ति, संस्था या परंपरा पर बिना प्रश्न किए आँख मूँदकर विश्वास करने लगता है,तब उसकी सोचने-समझने और सही-गलत का विवेक करने की क्षमता कम होने लगती है।आस्था का अर्थ है—विश्वास। ऐसा विश्वास जो मनुष्य को मानसिक स्थिरता और भावनात्मक शक्ति देता है। आस्था व्यक्ति को निराशा में आशा, भय में साहस और अकेलेपन में सहारा देती है।
एक किसान बीज बोते समय आस्था रखता है कि फसल उगेगी।एक माँ अपने बच्चे के भविष्य पर आस्था रखती है।एक रोगी डॉक्टर और दवा पर विश्वास रखता है।यह आस्था जीवन को चलाने के लिए आवश्यक है। बिना विश्वास के मनुष्य हर समय संदेह और भय में जीने लगेगा।समस्या तब शुरू होती है जब आस्था तर्क से ऊपर बैठ जाती है।जब व्यक्ति यह मान लेता है कि “जो मैं मानता हूँ, वही अंतिम सत्य है।” या “प्रश्न करना गलत है,या फिर यह सोचे कि “परंपरा चाहे जैसी हो, उसे मानना ही होगा।” ऐसे में तब तर्क शक्ति कमजोर होने लगती है।
यह तर्क शक्ति ही है जो मनुष्य को अन्य जीवों से अलग करती है,मनुष्य को प्रश्न करना सिखाती है।वह पूछती है—क्यों?कैसे?क्या यह सही है?क्या इसका कोई प्रमाण है?लेकिन अत्यधिक आस्था व्यक्ति को प्रश्न पूछने से रोक देती है। वह सोचने के बजाय केवल मानने लगता है। यह अंध आस्था है,जो घातक है। सामाजिक, राजनीतिक आर्थिक या आध्यात्मिक – कोई सा भी क्षेत्र हो,तर्क किये जाने चाहिए, प्रश्न पूछे जाने चाहिए और वाद-विवाद की आजादी पूरी तरह से मिलनी चाहिए वरना न समाज बढ़ेगा,न राज्य पनपेगा, फले-फूलेगा,न ही ईश्वर तक पहुंचा जा सकेगा क्योंकि मशीनी अंधानुकरण इंसान को गर्त में ढकेलेगा और संवेदनहीनता सृष्टि का विनाश लायेगी।
इतिहास गवाह है कि अंध-आस्था ने समाज को कई बार पीछे धकेला है।कभी लोगों ने यह मान लिया था कि रोग देवताओं के क्रोध से होते हैं, इसलिए चिकित्सा का विरोध किया गया।कभी स्त्रियों को अशुभ या कमजोर मानने वाली मान्यताओं को धर्म का रूप दे दिया गया।कभी जाति और छुआछूत को “ईश्वर की व्यवस्था” कहकर सही ठहराया गया।इन सबके पीछे अंधी आस्था थी,लेकिन तर्क अनुपस्थित था।जब तर्क मर जाता है, तब मनुष्य दूसरों के हाथों नियंत्रित होने लगता है। वह स्वयं निर्णय लेने की क्षमता खो देता है। ऐसे समाज में ढोंग, पाखंड और शोषण बढ़ने लगते हैं।ऐसे में व्यक्ति, आस्था और तर्क- सबका क्षय होता है।
अत्यधिक आस्था केवल धर्म में ही नहीं, व्यक्तियों के प्रति भी दिखाई देती है।जब कोई व्यक्ति किसी नेता, गुरु, अभिनेता या विचारधारा को इतना महान मान लेता है कि उसकी गलतियाँ भी सही लगने लगें, तब तर्क शक्ति समाप्त होने लगती है।
यह स्थिति खतरनाक होती है, क्योंकि तब व्यक्ति सत्य नहीं, “अपनी आस्था” को बचाने लगता है।
वह तथ्य नहीं देखता, केवल वही सुनना चाहता है जो उसके विश्वास को मजबूत करे। लेकिन क्या केवल तर्क ही पर्याप्त है?नहीं,यह भी संभव नहीं।
यदि केवल तर्क हो और संवेदना न हो तो, जीवन कठोर और यांत्रिक बन जाता है। मनुष्य मशीन नहीं है। उसे भावनाएँ, विश्वास और आध्यात्मिक सहारा भी चाहिए।समस्या आस्था में नहीं, बल्कि “अति” में है।जिस प्रकार अत्यधिक क्रोध विनाशकारी होता है, उसी प्रकार अत्यधिक आस्था भी विवेक को दबा सकती है।संतुलित आस्था वह है जो मनुष्य को विनम्र बनाए, लेकिन प्रश्न पूछने से न रोके।जो मानवता सिखाए, लेकिन अंधानुकरण न कराए।जो आत्मबल दे, लेकिन विवेक न छीने।वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आस्था एक दूसरे के पूरक हैं।विज्ञान का अर्थ केवल प्रयोगशाला नहीं है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ है—हर बात को प्रमाण और तर्क की कसौटी पर परखना,नए विचारों के लिए खुले रहना,गलत साबित होने पर अपनी सोच बदलने की क्षमता रखना।एक स्वस्थ समाज वही होता है, जहाँ आस्था और तर्क दोनों साथ चलें।जहाँ मंदिर भी हों और पुस्तकालय भी।जहाँ पूजा भी हो और प्रश्न भी।जहाँ विश्वास हो, लेकिन विवेक भी जीवित रहे।
निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि आस्था मनुष्य को शक्ति देती है,लेकिन तर्क उसे दिशा देता है।यदि केवल आस्था होगी, तो मनुष्य अंधानुकरण का शिकार हो सकता है और यदि केवल तर्क होगा, तो जीवन संवेदनहीन हो सकता है।इसलिए आवश्यकता संतुलन की है।ऐसी आस्था की, जो मनुष्य को बेहतर बनाए,कमज़ोर नहीं।ऐसे तर्क की, जो अहंकार नहीं, सत्य की खोज करे।क्योंकि सच्चा विश्वास वही है, जो प्रश्नों से डरता नहीं, बल्कि उन्हें तार्किक तरीके से समझने की क्षमता देता है। जरूरी है दोनों संतुलित तरीके से अपनायें जायें और सही दिशा की तरफ सही तरीके से कदम बढ़ें।
© अर्चना अनुप्रिया




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