"जीवन और पर्यावरण"

“जीवन और पर्यावरण”
कल्पना कीजिए 2050 की गर्मी…तापमान 52°C से 60डिग्री सेल्सियस..आठ साल का कियान अपने दादू के साथ ‘सिटी सेंट्रल पार्क’ जाता है। बोर्ड पर लिखा था: Welcome to India’s Last Natural Tree — AC Zone Entry ₹500…कियान ने कांच के डोम के अंदर झांका। एक अकेला नीम का पेड़। उसके नीचे दादू बचपन में गिल्ली-डंडा खेलते थे। अब उसके चारों तरफ टिकट काउंटर, सेल्फी पॉइंट और Oxygen Bar था ..10 मिनट सांस लेने के पांच सौ रूपए।
कियान पूछता है, "दादू, पेड़ तो फ्री में ऑक्सीजन देते थे न? फिर पैसे क्यों?"
दादू हँसते हैं, सूखी हँसी। "बेटा, जब फ्री में थे तब हमने काट दिए। अब दुकान में बिक रहा है, तो लाइन लगाकर खरीद रहे हैं।" बाहर प्लास्टिक के नकली पेड़ लगे थे। उन पर स्पीकर से चिड़ियों की आवाज़ बज रही थी। असली चिड़िया कब की जा चुकी थीं।कियान ने जेब से एक बीज निकाला। स्कूल में दिया गया था,Plant for Future प्रोजेक्ट। गार्ड बोला, "यहाँ मिट्टी नहीं है बेटा। सब कंक्रीट है। बीज डस्टबिन में फेंक दो।” दादू ने कियान का हाथ पकड़ा। दोनों डोम से बाहर निकले। कियान ने मुट्ठी भींचकर बीज संभाल लिया। बोला, "दादू, मैं घर जाकर गमले में लगाऊंगा। जब बड़ा होगा तो फ्री में ऑक्सीजन दूंगा। प्रॉमिस।" दादू की आंख भर आई। सालों पहले वो भी ऐसे ही प्रॉमिस करते थे। पर कल लगाएंगे कहते-कहते आज कल ही खत्म हो गया।
मतलब, पेड़ काटे हमने, सांसें बिकेंगी बच्चों की…हम नेचर से प्रोडक्ट पर शिफ्ट हो गए। पहले पेड़ छाया देते थे,अब “Shade Pro Max” बिकता है। पहले नदी पानी देती थी,अब Himalayan Mineral Water खरीदकर पीते हैं ।जो मुफ्त था,उसे हमने खत्म किया।अब उसी की EMI भर रहे हैं। विडंबना ये कि Oxygen Cylinder तो खरीद लेंगे, पर Oxygen देने वाला पर्यावरण नहीं बचायेंगे।
विकास और विनाश के बीच का फर्क ही मिटा दिया है हमने।छः लेन हाईवे चाहिये, हजारों पेड़ कुर्बान। मॉल चाहिए,तालाब पाट दो…AC वाला फ्लैट चाहिए 50°C की गर्मी मंजूर। हम भूल ही गए कि विकास का मतलब ऊपर जाना नहीं, साथ ले जाना होता है। नदी, जंगल, हवा सबको साथ लेकर प्रगति ।वरना हम उस बिल्डिंग में रहेंगे जिसकी तीसवीं मंजिल पर भी सांस लेने के लिए पाइप लगाना पड़ेगा। आनेवाला कल किसी और का नहीं, हमारे ही बच्चों का है।क्लाइमेट चेंज हमारे लिए अभी न्यूज़ है,कियान जैसे हमारे भावी बच्चों के लिए लाइफ होगी। दिल्ली में AQI 500 हम झेल लेते हैं, पर क्या भावी पीढ़ी झेल पाएगी? हम फ्रिज की ठंडक में बैठकर सोचते हैं,ग्लोबल वॉर्मिंग तो धीरे-धीरे होगी पर, हमारी धरती मां का बुखार अब 102°C पार कर रहा है। अब यह पैरासिटामोल से नहीं,परहेज़ से उतरेगा।छोटे काम करके ही बड़े इम्पैक्ट दिखेंगे।सरकार पॉलिसी बनाएगी,विश्व संस्थानें रिपोर्ट देंगी पर,असली चेंज तो कियान के गमले से ही शुरू होगा।
एक बीज से एक उम्मीद पनपेगी। क्यों न बर्थडे पर केक नहीं, पौधा गिफ्ट किया जाये, उम्र के हिसाब से पौधे लगाते जायें।दुकानदार पॉलिथीन दे तो ना बोल दें .. यह शर्म नहीं, शान है।नल बंद करके ब्रश करें,जल सजायें।बूंद-बूंद से ही समंदर भरता है और खाली भी होता है।नेता से कंक्रीट जंगल नहीं,पेड़ के जंगल मांगे जायें। वोट देते वक्त पूछें कि पिछले पांच साल में कितने पेड़ लगे, कितने कटे?धरती हमारी माँ है, ATM मशीन नहीं।हमने माँ से सिर्फ निकाला है,जमा कुछ नहीं किया। तो अब, बैलेंस निगेटिव है। अगर आज भी हम कल लगाएंगे कहेंगे, तो कल हमारे बच्चे Oxygen Bar के बाहर लाइन में खड़े मिलेंगे। हजारों रुपए के टिकट के साथ।
जीवन कीमती है।छोटे से जीवन-काल में ही पता नहीं कितने कर्म करने हैं,कितनी जिम्मेदारियां निपटानी हैं। परन्तु,ये तभी संभव है जब तन और मन दोनों स्वस्थ रहें और अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है,स्वस्थ पर्यावरण–जो प्रदूषणमुक्त हो और प्राकृतिक हो। पर्यावरण दो शब्दों से मिलकर बना है – “परि" जो हमारे चारों ओर है"आवरण" जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है,अर्थात पर्यावरण का शाब्दिक अर्थ होता है– आवरण,जो चारों तरफ से घेरे हुए है। पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत एक इकाई है, जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनके रूप,जीवन और जीवितावस्था को तय करते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाये तो, किसी भी जीवन को पनपने और विकसित होने के लिए जरूरी है कि आसपास का पर्यावरण शुद्ध हो और जीवन के अनुकूल हो।
पर्यावरण के प्रमुख कार्यों में संसाधन, प्रावधान, जलवायु अधिनियम, जीवन-पोषण, अवशोषित करना और सौंदर्य सेवायें देना शामिल हैं।पृष्ठभूमि जल, वायु और उपजाऊ मिट्टी जैसे आवश्यक संसाधनों की आपूर्ति करती है और मौसम के पैटर्न और पोषक चक्र को नियंत्रित करती है। यह जैव विविधता का समर्थन करता है और मानव कल्याण में योगदान देता है। परन्तु,जब प्रकृति द्वारा निर्मित वस्तुओं के अवशेष को मानव निर्मित वस्तुओं के अवशेष के साथ मिला दिया जाता है तब दूषक पदार्थों का निर्माण होता है। दूषक पदार्थों का पुनर्चक्रण नहीं किया जा सकता है या कहें कि नहीं किया जाता है, जिसके फलस्वरूप अवांछनीय अवयव पर्यावरण को अशुद्ध करते हैं।
पृथ्वी का वातावरण बहुस्तरीय है। पृथ्वी से लगभग 50 किमी ऊँचाई पर स्ट्रेटोस्फीयर है, जिसमें ओजोन स्तर होता है। यह स्तर सूर्यप्रकाश की पराबैगनी किरणों को शोषित कर उसे पृथ्वी तक पहुँचने से रोकता है। आज ओजोन स्तर का तेजी से विघटन हो रहा है, वातावरण में स्थित क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस के कारण ओजोन स्तर का विघटन हो रहा है।इस विशाल घटना को ओजोन छिद्र कहते हैं। मानव आवास वाले विस्तारों में भी ओजोन छिद्रों के फैलने की संभावना हो सकती है।ओजोन स्तर के घटने के कारण ध्रुवीय प्रदेशों पर जमी हुई बर्फ पिघलने लगी है।इसकी वजह से मानव को अनेक प्रकार के चर्म रोगों का भी सामना करना पड़ रहा है। ये रेफ्रिजरेटर और एयरकण्डीशनर में से उपयोग में होने वाले फ़्रियोन और क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस के कारण ही उत्पन्न हो रही समस्या है, जिससे वातावरण दूषित हो रहा है।यह भी सच है कि वाहनों तथा फैक्ट्रियों से निकलने वाले गैसों के कारण भी हवा प्रदूषित हो रही है।मानव कृतियों से निकलने वाले कचरे को नदियों में छोड़ा जाता है, जिससे जल प्रदूषण होता है। लोंगों द्वारा बनाये गये अवशेषों को पृथक न करने के कारण बने कचरे को फेंके जाने से भी भूमि प्रदूषण होता है। प्रदूषण कई प्रकार के होते हैं।जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण,ध्वनि प्रदूषण,मृदा प्रदूषण आदि। इस तरह के प्रदूषण बीमारियों के कारण बन जाते हैं,जिसमें अंधापन, शरीर के अंगों को लकवा मार जाना और श्वसन क्रिया आदि के विकार शामिल हैं। जब यह जल, कपड़ा धोने अथवा नहाने के लिये नियमित प्रयोग में लाया जाता है तो त्वचा रोग उत्पन्न हो जाता है।इसके अलावा भूमि प्रदूषण भी फ़ैल रहा है।इसका अभिप्राय जमीन पर जहरीले, अवांछित और अनुपयोगी पदार्थों के भूमि में विसर्जित करने से है, क्योंकि इससे भूमि का निम्नीकरण होता है तथा मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित होती है। लोगों की भूमि के प्रति बढ़ती लापरवाही के कारण भूमि प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है।भूमि प्रदूषण के मुख्य कारण हैं..कृषि में उर्वरकों, रसायनों तथा कीटनाशकों का अधिक प्रयोग;औद्योगिक इकाईयों, खानों तथा खादानों द्वारा निकले ठोस कचरे का विसर्जन;भवनों, सड़कों आदि के निर्माण में ठोस कचरे का विसर्जन;कागज तथा चीनी मिलों से निकलने वाले पदार्थों का निपटान, जो मिट्टी द्वारा अवशोषित नहीं हो पाते; प्लास्टिक की थैलियों का अधिक उपयोग, जो जमीन में दबकर नहीं गलती और घरों, होटलों और औद्योगिक इकाईयों द्वारा निकलने वाले अवशिष्ट पदार्थों का निपटान, जिसमें प्लास्टिक, कपड़े, लकड़ी, धातु, काँच, सेरामिक, सीमेंट आदि सम्मिलित हैं। इसके अनेक हानिकारक प्रभाव हैं – कृषि योग्य भूमि की कमी,भोज्य पदार्थों के स्रोतों को दूषित करने के कारण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक,भूस्खलन से होने वाली हानियाँ तथा जल तथा वायु प्रदूषण में वृद्धि ।
ध्वनि प्रदूषण भी आजकल पर्यावरण को दूषित कर रहा है।अनियंत्रित, अत्यधिक तीव्र एवं असहनीय ध्वनि को ध्वनि प्रदूषण कहते हैं।ध्वनि प्रदूषण की तीव्रता को ‘डेसिबल इकाई’ में मापा जाता है।शहरों एवं गाँवों में किसी भी त्योहार व उत्सव में, राजनैतिक दलों के चुनाव प्रचार व रैलियों में लाउडस्पीकरों का अनियंत्रित इस्तेमाल करने से ध्वनि प्रदूषण फैलता है। आजकल गाड़ियां भी बहुत हो गयी हैं।हर घर में औसतन दो गाड़ियां तो होती ही हैं।अनियंत्रित वाहनों के विस्तार के कारण उनके इंजन एवं होर्न के कारण भी ध्वनि प्रदूषण बहुत बढ़ गया है।औद्योगिक क्षेत्रों में उच्च ध्वनि क्षमता के पावर सायरन, हॉर्न तथा मशीनों के द्वारा होने वाले शोर तथा जनरेटरों एवं डीजल पम्पों आदि से भी ध्वनि प्रदूषण फैलने लगा है।ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव से श्रवण शक्ति का कमजोर होना, सिरदर्द, चिड़चिड़ापन, उच्चरक्तचाप अथवा स्नायविक, मनोवैज्ञानिक दोष उत्पन्न होने लगते हैं। लंबे समय तक ध्वनि प्रदूषण के प्रभाव से स्वाभाविक परेशानियाँ बढ़ जाती है।नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर ध्वनि प्रदूषण का बुरा प्रभाव पड़ता है तथा इससे कई प्रकार की शारीरिक विकृतियां उत्पन्न हो जाती हैं। गैस्ट्रिक, अल्सर और दमा जैसे शारीरिक रोगों तथा थकान एवं चिड़चिड़ापन जैसे मनोविकारों का कारण भी ध्वनि प्रदूषण ही है।
बढ़ती बिजली की जरुरत और काम के लिए बढ़ती बिजली की खपत प्रकाश प्रदूषण का कारण बन रहा है।बढ़ती गाड़ियों के कारण हाई वोल्ट के बल्ब का इस्तेमाल बहुत मात्रा में होने लगा है।हर सामाजिक,राजनीतिक कार्यक्रमों में जरुरत से ज्यादा डेकोरेशन होने लगा है, जिसमें बिजली और प्रकाश अति मात्रा में उपयोग किये जा रहे हैं।एक कमरे में अधिक बल्ब को लगाने का भी चलन बढ़ा है।
इससे शरीर पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।अक्सर तेज रौशनी से आँखो के आगे अंधकार सा छा जाता है,जो गाड़ी चलाते समय एक्सीडेंट का कारण बन सकता है। दिमाग में दर्द होना,मनुष्य का अँधा होना आदि प्रकाश प्रदूषण के लक्षण हैं।
उपाय..
प्रदूषण की समस्या को कम करने हेतु यह आवश्यक है कि अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाये।वृक्षारोपण हेतु सीमित स्थान होने के कारण यह आवश्यक है कि जनसाधारण में यह चेतना जागृत हो कि वह अपने आवास के सामने औद्योगिक परिसरों में कोई भी स्थान खाली न छोड़े तथा वहां पर वृक्ष रोपित करें।पर्यावरण को सुधारने के लिये सरकार भरसक प्रयास कर रही है।इस संबंध में बहुत से कानून भी बने हैं और आवश्यकतानुसार बनाये जा रहे हैं। न्यायालयों के आदेश और कड़े रुख ने काफी हद तक प्रदूषण के नियमन में सहायता दी है।वैज्ञानिक दृष्टि से प्रत्येक सरकार इस ओर विशेष ध्यान देती है। जनपद गाजियाबाद में दिल्ली राजधानी सीमा में लगे हुए क्षेत्र में 600 एकड़ भूमि पर साईंधाम नाम से वाटिका का विकास किया गया है, जिसे पर्यटन एवं पर्यावरण के उददेश्य से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जनपद गाजियाबाद में पर्यावरण का एक कार्यालय भी कार्यरत है। राज्य सरकार द्वारा पर्यटन एवं पर्यावरण हेतु जिला योजना के अंर्तगत प्रत्येक वर्ष धनराशि का प्रावधान किया जाता है। मोटर साईकिल स्कूटर, कार एवं अन्य वाहनों में गुणोत्तर वृद्वि हुई है, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ रहा है।इसके लिए भी अनेक नियमों का निर्माण किया गया है और कड़ाई से उन नियमों का पालन भी किया जा रहा है।प्रदूषण की समस्या को कम करने हेतु यह आवश्यक है कि अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाए।इस संबंध में हरेक नागरिक को काम करने की जरूरत है।जब सरकार और जनता साथ इस दिशा में कदम बढ़ायेंगे तभी प्रदूषण को रोकना संभव हो पायेगा। कोरोनाकाल में लौकडाउन के दौरान यह प्रत्यक्ष रूप से देखा गया कि जब लोगों ने प्लास्टिक, कचरा, अनावश्यक गंदगी पर रोक लगायी तो वातावरण, नदियां आदि स्वच्छ होने लग गये थे। हमें गंभीरता से इस दिशा में काम करने की जरूरत है,तभी हम प्रदूषण मुक्त पर्यावरण का निर्माण कर सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ और स्वस्थ धरा सौंपकर निश्चिंत हो पायेंगे।
© अर्चना अनुप्रिया



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