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"डिजिटल अरेस्ट -स्क्रीन र हथकड़ी"

  • Writer: Archana Anupriya
    Archana Anupriya
  • 5 hours ago
  • 7 min read

“डिजिटल अरेस्ट- स्क्रीन पर हथकड़ी”


रामदयाल मास्टर जी को रिटायर हुए दो साल हुए थे। पेंशन आती थी और परिवार साथ था।पोते से नयी तकनीक सीखते,दोस्तों से वीडियो कॉल पर चैटिंग करते और तरह-तरह की किताबें पढ़ते थे। जिंदगी सुकून और शांति से कट रही थी।

एक दिन सुबह 10 बजे फोन बजा। अनजान नंबर था। रामदयाल जी ने फोन उठाया।उधर से आवाज आई –

"हैलो, मैं CBI ऑफिसर संतोष कपूर बोल रहा हूं। रामलाल वर्मा जी हैं आप?"

मास्टर जी कुर्सी पर सीधे बैठ गए। "जी..जी.. मैं ही हूं।"

"आपके आधार कार्ड से दुबई एक पार्सल गया है। उसमें 200 ग्राम ड्रग्स, 5 पासपोर्ट और फर्जी ATM कार्ड मिले हैं। आप डिजिटल अरेस्ट में हैं।"

मास्टर जी के हाथ से चाय छलक गई.. "पर साहब मैंने तो..."

"चुप..अभी वीडियो कॉल ज्वॉइन करो। 4 घंटे तक कैमरा बंद नहीं होगा। घर से बाहर गए तो भागने का केस बनेगा,समझे?" व्हाट्सएप पर वीडियो कॉल आया। दूसरी तरफ कड़ा रुख किये कोट और टाई में एक आदमी बैठा था। पीछे "CBI" का बोर्ड और ‘लोगो’ दिखाई दे रहा था।टेबल पर फाइलें रखीं थीं।वह आदमी बोला,"देखो मास्टर जी, आपकी उम्र का लिहाज कर रहा हूं वरना, अभी टीम भेजकर उठवा लेता आपको। सहयोग करो तो शायद बच जाओगे।" मास्टर जी की तो सांस फूलने लगी। पत्नी कमरे में आई, "किसका फोन है जी?" मास्टर जी फुसफुसाए, "चली जाओ यहां से। राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। बताना मना है।"

चार घंटे। वही कुर्सी, वही कैमरा। पानी तक नहीं पिया। "अब सुनो," आफिसर दिखने वाला वह आदमी बोला,"तुम्हारा खाता सीज होने वाला है। सारा पैसा सरकारी खाते में ट्रांसफर करो जांच के लिए। जांच के बाद वापस मिल जाएगा। 8 लाख हैं न तुम्हारे खाते में?"

मास्टर जी का दिल बैठ गया। जिंदगी भर की जमा पूंजी। पोते की पढ़ाई, पत्नी का इलाज।

"साहब कुछ तो रहम..."

"चुप करो.. दस मिनट हैं तुम्हारे पास। UPI आईडी नोट करो। नहीं भेजा तो जीप अभी पहुंचेगी। मोहल्ले में बदनामी अलग होगी।"

मास्टर जी ने कांपते हाथों से अपना मोबाईल फोन उठाया। UPI डालने ही वाले थे कि पोता कमरे में आ गया। "दादू, खाना खा लो।"

स्क्रीन पर सूट वाले ने देखा तो जोर से चिल्लाया, "ये कौन है? मैंने कहा था न किसी से बात नहीं करनी…काटो कॉल।"

पोता 12 साल का था। यूट्यूब देखता था। स्क्रीन देखकर बोला, "दादू, ये तो फ्रॉड है। मेरी क्लास में पुलिस अंकल आए थे। बोले थे कि डिजिटल अरेस्ट तो कभी होता ही नहीं है।" मास्टर जी का हाथ रुक गया। दिमाग की बत्ती जली। 40 साल बच्चों को पढ़ाया था। आज पोता उन्हें पढ़ा रहा था।उन्होंने धीरे से पूछा, "साहब, एक बात बताओ। CBI वाले व्हाट्सएप पर अरेस्ट करते हैं क्या?"

उधर सन्नाटा। फिर गाली। कॉल कट गया।

मास्टर जी कुर्सी पर ढह गए। पसीने से तर-बतर…तभी पत्नी पानी लेकर आई।

"1930 याद है दादू?" पोते ने पूछा।

मास्टर जी ने कांपते हाथ से नंबर मिलाया। "साइबर क्राइम हेल्पलाइन,बेटा..जो आज तूने मुझे बचाया न, वो नंबर है।"

शाम को मास्टर जी छत पर बैठे थे। पोता पास था। "दादू, आप डरे क्यों?"

मास्टर जी ने आसमान देखा। "बेटा, इज्जत का डर सबसे बड़ा डर होता है। वो लोग इसी पर खेलते हैं।" "फिर क्या करें?"

"फोन आए तो पहले तुमको बताऊंगा,वादा।"


उस दिन मास्टर जी ने दो सबक सीखे। पहला, पुलिस कभी स्क्रीन पर हथकड़ी नहीं डालती। दूसरा, कभी-कभी बचाने वाला तुम्हारी गोद में खेल रहा होता है।रात को सोने से पहले उन्होंने गेट पर एक कागज चिपकाया। उस पर मोटे अक्षरों में लिखा था–"डिजिटल अरेस्ट झूठ है। फोन आए तो 1930 मिलाओ। डरो मत, बात करो।" सुबह दूधवाले से लेकर डाकिए तक, सब रुककर वो कागज पढ़ रहे थे।


ऐसी घटनाएं आये दिन हो रही हैं,किसी स्त्री के साथ,किसी बच्ची के साथ,किसी कामकाजी पुरुष के साथ या किसी बुजुर्ग के साथ..कभी भी किसी के भी साथ यह घटना हो सकती है।अब प्रश्न उठता है कि यह डिजिटल अरेस्ट क्या है?सच कहें,तो यह स्क्रीन के पीछे का नया डर है,जो बहुत तेजी से समाज में ठगों और अपराधियों द्वारा फैलाया जा रहा है।ये कोई असली कानूनी प्रक्रिया नहीं है। ये साइबर ठगी का नया तरीका है।फोन आता है..दूसरी तरफ से आवाज आती है कि CBI से बोल रहा हूं या मुंबई पुलिस से या किसी नारकोटिक्स डिपार्टमेंट से किसी भी जांच संस्था का नाम ले लिया जाता है और फिर लोगों को डराने वाली बातें शुरू होती हैं। "आपके आधार से ड्रग्स का पार्सल पकड़ा गया है"... "आपके नाम से मनी लॉन्ड्रिंग हुई है.." "आप डिजिटल अरेस्ट में हैं.."आदि आदि।

फिर कहते हैं, "अब 5 घंटे वीडियो कॉल पर रहना होगा। कैमरा बंद नहीं करना। घर से बाहर नहीं जाना। किसी को बताया तो केस बिगड़ जाएगा।" इसी बीच बैंक डिटेल, OTP, पैसे ट्रांसफर करवा लेते हैं और डर के मारे लोग लाखों दे भी देते हैं।

अब प्रश्न उठता है कि सच क्या है.. ? यह डिजिटल अरेस्ट है क्या?

ये कोई असली गिरफ्तारी नहीं,साइबर अपराधियों का नया हथियार है।आपके पास फोनकॉल या वीडियो कॉल आते हैं..सामने पुलिस की वर्दी में कोई, CBI/ED/Narcotics का ID कार्ड दिखता है और वहां आफिसर के वेश में बैठा शख्स कहता है,"तुम्हारे आधार से मनी लॉन्ड्रिंग हुई है, पार्सल में ड्रग्स मिला है। तुम्हें 'डिजिटल अरेस्ट' किया गया है।" फिर 2-3 दिनों तक आपको वीडियो कॉल पर रखते हैं, घर से बाहर नहीं निकलने देते, बैंक डिटेल मांगते हैं। डराकर कहते हैं: "जमानत के लिए पैसे ट्रांसफर करो वरना जेल।" जबकि सच यह है कि भारत में 'डिजिटल अरेस्ट' नाम की कोई कानूनी प्रक्रिया है ही नहीं। पुलिस कभी भी WhatsApp या Skype पर गिरफ्तारी नहीं करती। ये 100% फ्रॉड है। बात तो यह कि भारत में डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई बात होती ही नहीं है। पुलिस,CBI, ED, कोर्ट आदि कभी भी व्हाट्सएप कॉल,स्काइप या वीडियो कॉल पर गिरफ्तारी नहीं करते। गिरफ्तारी के लिए पुलिस घर आती है,वारंट दिखाती है..हर तरह की गिरफ्तारी के अपने नियम हैं जो कानून में बताये गये हैं।दूसरी बात यह कि पुलिस कभी पैसे नहीं मांगती..कोई भी असली अफसर "केस रफा-दफा करने" के नाम पर UPI,बैंक ट्रांसफर,गिफ्ट कार्ड नहीं मांग सकता।ऐसी सोच ही गैर कानूनी है।

तीसरी बात यह है कि डर इनका हथियार है।ये लोग घंटों कॉल पर रखते हैं ताकि आप सोच न सको, किसी से सलाह न ले सको।ये लोग झूठ सच गढ़कर लोगों को फंसाते हैं।पुलिस की वर्दी पहनकर वीडियो कॉल पर नकली वर्दी, नकली आईडी, पीछे पुलिस स्टेशन जैसा बैकग्राउंड लगा लेते हैं।आपकी जानकारी वे पहले ही निकाल कर रखते हैं..आधार नंबर,पैन के आखिरी 4 अंक पहले से बोल देते हैं। ये सभी डेटा लीक से मिल जाते हैं इन्हें।फर्जी दस्तावेज लेकर गिरफ्तारी वारंट की PDF भेज देते हैं। मोहर, साइन सब नकली।व्यक्ति को अकेला करना इनके प्लान का हिस्सा होता है।कहते हैं "परिवार को मत बताना, राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है।" ताकि आप मदद न मांग पाओ।


अगर ऐसा कॉल आए तो क्या करें..


1.डरें मत, फोन काट दें।असली पुलिस फोन काटने पर दोबारा कॉल नहीं करेगी, घर आएगी।

2. स्क्रीन शेयर मत करें।कभी भी AnyDesk, TeamViewer जैसे ऐप डाउनलोड न करें। इनसे ये आपका फोन कंट्रोल कर लेते हैं।

3. पैसे न भेजें..एक रुपया भी नहीं। एक बार भेजा तो ये समझ जाएंगे आप डर गए, फिर और मांगेंगे।

4. बात करें.. तुरंत घरवालों से, दोस्त से बात करें। डर अकेले में बढ़ता है।

5. रिपोर्ट करें 1930 पर कॉल करें। ये साइबर क्राइम हेल्पलाइन है। http://cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करो।


घर के बड़ों को कैसे बचाएं

मां-बाप, दादा-दादी सबसे आसान शिकार हैं। उन्हें साफ बोल दें ,"पुलिस का फोन आए और पैसे मांगे तो समझ लेना फ्रॉड है। कोई भी वर्दी वाला वीडियो कॉल पर नहीं आएगा। डर लगे तो पहले मुझे फोन करना।"

ठग आपकी इज्जत और डर का फायदा उठाते हैं। इज्जत बचाने के चक्कर में पैसे मत गंवाओ। असली इज्जत सच बोलने में है, चुप रहने में नहीं।


मानवाधिकारों की सुरक्षा…

डिजिटल अरेस्ट स्कैम के खिलाफ मानवाधिकारों की सुरक्षा भी अत्यंत आवश्यक है। हमें पता होना चाहिए कि कहाँ होता है मानवाधिकार का हनन?

देखा जाये तो,डिजिटल अरेस्ट सिर्फ पैसे की ठगी नहीं है,ये हमारे चार बुनियादी अधिकार छीनता है..


निजता का अधिकार Art 21,जबरन वीडियो कॉल पर रखना, घर के अंदर झांकना, परिवार को दिखाने को कहना

गरिमा से जीने का अधिकार..वर्दी वाले से गाली-गलौज, "जेल भेज देंगे" कहकर मानसिक प्रताड़ना

वित्तीय सुरक्षा का अधिकार..डरा-धमकाकर जीवन भर की कमाई ट्रांसफर करा लेना

निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार Art 22 बिना वारंट, बिना वकील, बिना कोर्ट ..सीधे "सज़ा" सुना देना।


ये स्कैम बुजुर्गों और अकेले रहने वालों को टारगेट करता है। कई केस में पीड़ित ने डर या शर्म से आत्महत्या तक कर ली है। यानी ये केवल आर्थिक नहीं, 'मानवीय अपराध' भी है।इससे बचाव के पांच तरीके हैं,जो ..कानून और कॉमन सेंस के साथ चलते हैं..


नियम 1..पुलिस की 3 बातें याद रखें

1. असली पुलिस कभी वीडियो कॉल पर नहीं आती।

2. असली पुलिस कभी फोन पर पैसे नहीं मांगती।

3. असली पुलिस "डिजिटल अरेस्ट" शब्द इस्तेमाल नहीं करती।

कोई भी ये करे तो समझ लें,100% फ्रॉड..तुरंत कॉल काट दें।


नियम 2..डरें मत, सवाल करें।

पूछें– "FIR नंबर क्या है? किस थाने में केस दर्ज है? वारंट की कॉपी भेजो।"

स्कैमर होगा तो अटक जाएगा। असली पुलिस को बुरा नहीं लगेगा क्योंकि ये आपका हक है।


नियम 3..स्क्रीन शेयर, बैंक डिटेल मतलब जहर पीने को कहना जो आम तौर पर नहीं होता।

TeamViewer, AnyDesk जैसे ऐप डाउनलोड कराने को कहे तो मना कर दें। OTP, CVV, अकाउंट नंबर किसी को मत दें। असली अफसर को इसकी जरूरत नहीं होती।


नियम 4..'कट' करें और 'क्रॉस-चेक' करें

कॉल काटकर सीधे 1930 पर कॉल करें.. ये साइबर क्राइम का हेल्पलाइन नंबर है। या फिर अपने नजदीकी थाने जायें।10 मिनट लगेंगे पर 10 लाख बचेंगे।


नियम 5.. परिवार को बतायें

स्कैमर कहते हैं: "किसी को बताया तो केस बिगड़ जाएगा।" ये झूठ है। असली केस में परिवार को बताना जरूरी होता है। चुप रहने से आप फंसते हो।


4.. सरकार और हम क्या कर सकते हैं?


सरकार की जिम्मेदारी..

पहला,तेज़ एक्शन लेते हुए 1930 पर शिकायत के 2 घंटे में बैंक अकाउंट फ्रीज होने चाहिए।यदि देरी हो तो पैसा निकल जाता है।

दूसरा,जागरूकता जरूरी है।TV या रेडियो पर अमिताभ बच्चन वाले 'डिजिटल अरेस्ट' के ऐड जैसे कैंपेन हर भाषा में चलें।

तीसरे,टेलीकॉम पर लगाम होना चाहिए।फर्जी नंबर जैसे, +92, +84 वाले नंबर और वर्चुअल नंबरों पर सख्ती करनी चाहिए।


हमारी जिम्मेदारी

बुजुर्गों को ट्रेनिंग देनी चाहिए।घर के बड़े-बुजुर्गों को हफ्ते में 1 बार बैठाकर समझायें।हो सके तो मॉक कॉल करके प्रैक्टिस करायें।

शर्म छोड़कर रिपोर्ट करें।ठगी हो जाए तो "लोग क्या कहेंगे" कभी मत सोचें।

सरकार की क्राईम रिपोर्टिंग साइट पर जाकर रिपोर्ट करें। आपकी रिपोर्ट से 10 और बचेंगे। लालच से बचें।"केस बंद करने के 2 लाख लगेंगे" ये सुनते ही समझ जायें कि सामने ठग है।


डर ही इन अपराधियों की करेंसी है।डिजिटल अरेस्ट स्कैम पैसे से नहीं, 'डर' से चलता है।

याद रखें,भारत का संविधान आपको ये हक देता है कि बिना लिखित वारंट, बिना वकील, बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश हुए आपको कोई छू भी नहीं सकता।


तो अगली बार कोई 'डिजिटल पुलिस' बने तो तीन काम करें—

हंसें, क्योंकि वो जोकर है,फोन काटें, क्योंकि वो फ्रॉड है और बतायें, 1930 पर कौल करके क्योंकि यह अपराध है।अधिकार तभी तक आपके हैं जब तक आप उन्हें जानते हो।डर त्यागकर सवाल करें। आपकी एक 'ना' किसी की पूरी ज़िंदगी बचा सकती है।


©अर्चना अनुप्रिया

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