"नन्हें बच्चे और उनका भविष्य"

“नन्हें बच्चे और उनका भविष्य”
छोटे बच्चे कोमल मिट्टी के समान होते हैं। उनके मन पर परिवार के व्यवहार,माता-पिता की भाषा, घर के वातावरण और आसपास की घटनाओं का गहरा प्रभाव पड़ता है। वे केवल वही नहीं सीखते जो उन्हें सिखाया जाता है, बल्कि बहुत कुछ वह भी सीखते हैं जो वे अपने बड़ों को करते हुए देखते हैं।यदि घर में प्रेम, सम्मान, धैर्य और सहयोग का वातावरण है,तो बच्चा दूसरों के प्रति संवेदनशील होना सीखता है।यदि घर में निरंतर क्रोध, अपमान, झूठ और कलह का वातावरण है,तो उसके मन में असुरक्षा, भय और आक्रामकता जन्म ले सकती है।इसलिए यह समझना आवश्यक है कि बच्चों को अच्छे संस्कार देने का सबसे प्रभावशाली तरीका उपदेश देना नहीं, बल्कि स्वयं उनका उदाहरण बनना है।
आज का युग प्रतिस्पर्धा का युग है।माता-पिता अपने बच्चों को सर्वोत्तम विद्यालय,आधुनिक तकनीक, महँगे खिलौने और हर प्रकार की सुविधा देना चाहते हैं। उनकी यह आकांक्षा स्वाभाविक भी है,लेकिन, प्रश्न यह है कि क्या भौतिक सुविधाएँ ही बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की गारंटी हैं?बच्चे को महँगा खिलौना मिल सकता है, लेकिन उसके साथ खेलने वाला कोई न हो तो उसकी खुशी अधूरी रह जाती है। उसे सर्वोत्तम विद्यालय में प्रवेश मिल सकता है,लेकिन घर में उसकी बात सुनने वाला कोई न हो तो उसके मन में अकेलापन पनप सकता है। उसे जीवन की हर सुविधा मिल सकती है, लेकिन असफलता सहने, निराशा से उबरने और समस्याओं का सामना करने की क्षमता न मिले तो वह छोटी-सी कठिनाई से भी विचलित हो सकता है।बच्चों को केवल सफल होना नहीं, असफलता के बाद फिर से उठना भी सिखाया जाना चाहिए। उन्हें केवल प्रतियोगिता में आगे बढ़ना नहीं, दूसरों की सफलता का सम्मान करना भी आना चाहिए। उन्हें अपने अधिकारों के प्रति सजग बनाने के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का बोध कराना भी आवश्यक है।
मोबाइल युग के बच्चे
तकनीकी विकास के इस युग में मोबाइल और डिजिटल संसार का बचपन देखा जा रहा है।
आज छोटे बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन और टैबलेट सहज ही दिखाई देते हैं। कभी ये उपकरण बच्चों को व्यस्त रखने का माध्यम बनते हैं, तो कभी भोजन कराने, रोना रोकने या माता-पिता को घरेलू कार्यों के लिए समय देने का आसान उपाय।डिजिटल तकनीक अपने आप में बुरी नहीं है। इसके माध्यम से बच्चे नई जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं, रचनात्मक गतिविधियाँ सीख सकते हैं और अपनी जिज्ञासाओं का समाधान पा सकते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब स्क्रीन बच्चों के खेल, बातचीत, नींद, शारीरिक गतिविधियों और वास्तविक दुनिया से जुड़ाव का स्थान लेने लगती है।बचपन को केवल आभासी संसार में सीमित नहीं किया जा सकता। मिट्टी में खेलना,पेड़-पौधों को देखना,पक्षियों की आवाजें सुनना, कहानी सुनना, चित्र बनाना और दूसरे बच्चों के साथ खेलना भी उतना ही आवश्यक है।माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के स्क्रीन समय पर आयु के अनुरूप सीमाएँ तय करें,उनके साथ स्वयं भी समय बिताएँ और घर में बातचीत तथा खेल की संस्कृति विकसित करें। बच्चों को मोबाइल से दूर रखने का सबसे अच्छा तरीका केवल मोबाइल छीनना नहीं, बल्कि उन्हें उससे अधिक आनंददायक विकल्प देना है।
बहुत जरूरी है कि अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित किया जाये।बच्चों के पालन-पोषण में ये दो अतियाँ विशेष रूप से दिखाई देती हैं।एक ओर वे माता-पिता हैं जो बच्चों पर अपनी इच्छाएँ थोपते हैं,उनकी प्रत्येक गतिविधि नियंत्रित करते हैं और गलती करने पर कठोर दंड देते हैं। दूसरी ओर वे माता-पिता हैं जो प्रेम के नाम पर बच्चों की हर माँग पूरी करते हैं और अनुशासन को अनावश्यक बंधन मानते हैं।दोनों ही स्थितियाँ बच्चे के संतुलित विकास में बाधक बन सकती हैं।बच्चों को न तो इतना दबाया जाना चाहिए कि वे अपनी बात कहने से डरें और न ही इतनी निरंकुश स्वतंत्रता दी जानी चाहिए कि वे सही-गलत का अंतर ही न समझें। उन्हें अपनी उम्र के अनुसार निर्णय लेने के अवसर मिलने चाहिए, लेकिन उन निर्णयों के परिणामों को समझने का मार्गदर्शन भी मिलना चाहिए।अनुशासन का अर्थ भय उत्पन्न करना नहीं,बल्कि आत्मनियंत्रण विकसित करना है। बच्चों को यह समझाना अधिक प्रभावी है कि कोई व्यवहार अनुचित क्यों है, बजाय इसके कि केवल यह कह दिया जाए कि ऐसा करना मना है।जहाँ प्रेम के साथ मर्यादा हो और स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व, वहीं स्वस्थ व्यक्तित्व का विकास होता है।
हां,बच्चों की भावनाओं को समझना भी जरूरी है।बच्चे हमेशा अपनी भावनाएँ शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। कभी वे चिड़चिड़े हो जाते हैं,कभी जिद करते हैं,कभी चुप रहने लगते हैं और कभी छोटी-सी बात पर रो पड़ते हैं। प्रत्येक व्यवहार को केवल शरारत या अवज्ञा मान लेना उचित नहीं है।उनके व्यवहार के पीछे थकान, भय, असुरक्षा, ध्यान की आवश्यकता या किसी बात को न समझ पाने की परेशानी हो सकती है।जब बच्चा अपनी बात कहे, तो उसे बीच में रोके बिना सुनना चाहिए। उसकी भावनाओं को तुच्छ नहीं समझना चाहिए। यदि वह किसी बात से डरता है,तो उसका उपहास करने के बजाय उसके डर को समझने का प्रयास करना चाहिए। विशेष रूप से यह आवश्यक है कि बच्चे अपने माता-पिता से ऐसी बातें भी साझा कर सकें,जिनके कारण उन्हें डाँट पड़ने का भय हो। जिस घर में बच्चे अपनी समस्याएँ निःसंकोच बता सकते हैं, वहाँ माता-पिता उनके लिए केवल संरक्षक नहीं, बल्कि विश्वासपात्र भी बनते हैं।
संस्कार,नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व बच्चों को सिखाना बहुत जरूरी है।शिक्षा बच्चे को ज्ञान देती है,लेकिन संस्कार उस ज्ञान के उपयोग की दिशा निर्धारित करते हैं। बुद्धिमत्ता यदि संवेदनशीलता से रहित हो,तो उसका उपयोग स्वार्थ के लिए भी किया जा सकता है। सफलता यदि नैतिकता से अलग हो जाए,तो वह समाज के लिए कल्याणकारी नहीं रह जाती।इसलिए बच्चों को बचपन से ही सत्य बोलने, दूसरों का सम्मान करने, श्रम का मूल्य समझने, पर्यावरण की रक्षा करने और कमजोर व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति रखने की शिक्षा देनी चाहिए।उन्हें यह भी बताना चाहिए कि किसी व्यक्ति का मूल्य केवल उसके अंकों, धन, पद या बाहरी रूप से निर्धारित नहीं होता। दूसरों की सहायता करना, अपनी गलती स्वीकार करना और अन्याय के विरुद्ध विवेकपूर्ण ढंग से आवाज उठाना भी अच्छे व्यक्तित्व की पहचान है।
संस्कारों का अर्थ केवल परंपराओं का पालन करना नहीं, बल्कि परंपरा और परिवर्तन के बीच विवेकपूर्ण संतुलन स्थापित करना भी है। बच्चों को प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए ताकि वे अंधानुकरण के बजाय समझ और तर्क के आधार पर अपने विचार विकसित कर सकें।
बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि भविष्य की तैयारी केवल करियर बनाना नहीं बल्कि सही,शांत और कर्तव्यपरायण जीवन जीना भी है।अक्सर बच्चों के भविष्य की चर्चा करते समय डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, अधिकारी या अन्य सफल पेशेवर बनने की संभावनाओं पर अधिक ध्यान दिया जाता है। लेकिन क्या भविष्य केवल अच्छी नौकरी और आर्थिक समृद्धि का नाम है?एक बच्चा पढ़ाई में उत्कृष्ट हो सकता है,लेकिन यदि वह दूसरों के प्रति असंवेदनशील है,अपनी भावनाओं को संभाल नहीं पाता या कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय नहीं ले सकता तो उसके विकास को पूर्ण नहीं कहा जा सकता।
भविष्य के लिए बच्चों में कुछ मूलभूत क्षमताएँ पैदा करना आवश्यक है।उनमें आत्मविश्वास जगाना चाहिए ताकि वे अपनी योग्यता पहचानें और असफलता से भयभीत न हों।उनमें विवेक ऐसा हो कि वे सूचना और भ्रम, सत्य और असत्य तथा उचित और अनुचित में अंतर कर सकें।भावनात्मक संतुलन भी उनके अंदर जागृत हो कि वे क्रोध, निराशा और तनाव का सामना स्वस्थ तरीके से कर सकें।उनमें सामाजिक संवेदनशीलता होनी चाहिए ताकि वे दूसरों की परिस्थितियों और भावनाओं को समझ सकें।उनकी रचनात्मकता ऐसी हो कि वे प्रश्न पूछें,नए विचार सोचें और समस्याओं के समाधान खोजें।नैतिक रूप से उनका साहसी होना जरूरी है ताकि वे कठिन परिस्थिति में भी उचित कार्य करने का प्रयास करें।कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तीव्र तकनीकी परिवर्तन के इस दौर में केवल जानकारी याद रखना पर्याप्त नहीं होगा। सीखने की इच्छा, आलोचनात्मक चिंतन, मानवीय संवेदना और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को विकसित करने की क्षमता भविष्य की महत्वपूर्ण आवश्यकताएँ होंगी।
बच्चों के माता-पिता और विद्यालय की साझा जिम्मेदारी है कि बच्चों को सही मार्गदर्शन मिले।बच्चों का व्यक्तित्व निर्माण केवल परिवार या विद्यालय में से किसी एक की जिम्मेदारी नहीं है। दोनों की भूमिका परस्पर पूरक है। विद्यालय ज्ञान,अनुशासन,सामूहिक जीवन और सहयोग का अवसर देता है,जबकि परिवार भावनात्मक सुरक्षा,जीवन-मूल्यों और व्यवहार की पहली पाठशाला होता है। माता-पिता को बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करने से बचना चाहिए। प्रत्येक बच्चे की रुचि, क्षमता और सीखने की गति अलग होती है। तुलना से प्रेरणा मिलने के बजाय हीनभावना और अनावश्यक प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।इसी प्रकार शिक्षकों को भी केवल परीक्षा के अंकों के आधार पर बच्चों का मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।उनकी जिज्ञासा,रचनात्मकता, सहयोग की भावना और व्यक्तिगत प्रगति को भी महत्त्व देना चाहिए।जब परिवार और विद्यालय एक-दूसरे के सहयोगी बनते हैं,तब बच्चे को सीखने और विकसित होने के लिए अधिक सुरक्षित एवं सकारात्मक वातावरण मिलता है।
निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि आज का बचपन ही कल का समाज है।बच्चे केवल अपने माता-पिता का ही भविष्य नहीं हैं,वे आने वाले समाज, राष्ट्र और मानवता का भविष्य भी हैं। उनके भीतर हम जिस प्रकार के विचार, मूल्य और व्यवहार विकसित करेंगे, वही आगे चलकर सामाजिक जीवन का हिस्सा बनेंगे।यदि हम बच्चों को केवल प्रतिस्पर्धा करना सिखाएँगे,तो वे दूसरों को पीछे छोड़ने में कुशल हो सकते हैं लेकिन यदि हम उन्हें सहयोग करना भी सिखाएँगे तो वे सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास करेंगे। यदि हम उन्हें केवल धन कमाने का महत्त्व बताएँगे, तो वे आर्थिक सफलता को ही जीवन का लक्ष्य मान सकते हैं परन्तु यदि हम उन्हें ईमानदारी, संवेदना और सामाजिक उत्तरदायित्व का मूल्य भी समझाएँगे,तो उनकी सफलता का अर्थ अधिक व्यापक होगा।बच्चों का भविष्य बनाने के लिए आवश्यक नहीं कि हम उन्हें हर कठिनाई से बचा लें। आवश्यक यह है कि हम उन्हें कठिनाइयों का सामना करने योग्य बनाएँ। हर प्रश्न का उत्तर देने के बजाय उनमें प्रश्न पूछने की जिज्ञासा जगाएँ। हर निर्णय स्वयं लेने के बजाय उन्हें उचित निर्णय लेने का विवेक दें। उनके लिए रास्ते आसान बनाने के साथ-साथ उनमें अपने रास्ते खोजने का साहस भी विकसित करें।अंततः, बच्चों को ऐसी परवरिश दें कि वे हमारी छाया में सुरक्षित रहें,हमारे संस्कारों से समृद्ध हों, अपने विवेक से निर्णय लें और अपनी प्रतिभा से संसार को बेहतर बनाने का प्रयास करें क्योंकि एक बच्चे का उज्ज्वल भविष्य केवल उसके जीवन की उपलब्धि नहीं, बल्कि एक बेहतर समाज के निर्माण की संभावना भी है।
©अर्चना अनुप्रिया



Comments