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हमारे कालेज का हौस्टल और परीक्षा की तैयारी”

  • Writer: Archana Anupriya
    Archana Anupriya
  • 20 hours ago
  • 9 min read

“हमारे कालेज का हौस्टल और परीक्षा की तैयारी” 


नीट की परीक्षा,पेपर लीक का सिलसिला, छात्रों का सड़क पर हंगामा और टीवी पर दुनिया भर की डिबेट..अजब सा नजारा हर चैनल पर दिख रहा था। बच्चों की मेहनत पर पेपर लीक का ऐसा कुठाराघात देखकर अफसोस भरा दिल अपने परीक्षा के दिनों को याद करने लगा।याद आने लगी परीक्षा की घड़ियां और वे सारी तैयारियां,जो परीक्षा के दिनों में हम हौस्टल में किया करते थे। 


हम लड़कियों का हौस्टल और एक्जाम का महीना–ये कॉम्बो किसी वेब सीरीज से कम नहीं था।जैसे ही परीक्षा की डेट अनाउंस हुई, हमारी धड़कनें बढ़ने लगती थीं।परीक्षा नजदीक आते ही हम सब धार्मिक प्रवृत्ति के होने लग जाते थे।लगभग हर कमरे में लड़कियों के अपने-अपने भगवानों की तस्वीरें दिखने लग जाती थीं।कारीडोर अगरबत्तियों की सुगंध से महकने लग जाता था।दिन भर तो इधर उधर की बातों में समय निकल जाता..फ़ालतू की गपशप और अच्छा खाना- ये दो ही तो हमारे मुख्य रूचि के विषय होते थे लेकिन,रात को स्टडी टाईम की घंटी बजते ही हमारे अंदर से सरस्वती मां के लिए भांति-भांति की प्रार्थनायें मानो अपने-आप ही निकलने लगती थीं।

हौस्टल में जितना समय स्टडी आवर का होता था,उतना तो दूसरे, तीसरे कमरे में जा-जाकर दोस्तों से,सीनियर्स से नोट्स अर्जित करने में ही बीत जाता था।बैठकर पढ़ना तो स्टडी आवर की समाप्ति से कुछ देर पहले से ही आरंभ हो पाता था।लंबे से कौरीडोर में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बड़े-बड़े आकार के स्टडी-टेबल लगे होते थे,जिसके चारों ओर बेंत की बुनी बड़ी और आरामदायक कुर्सियां लगी होती थीं।यही वो जगह थी,जहां हम लड़कियां अपने-अपने कमरों से निकलकर पढ़ाई के लिए बैठती थीं। लेकिन,ऐसा मत समझिए कि हम-सब वहां सिर्फ पढ़ाई करने के लिए जमा होते थे।यह वो राउंड टेबल सीटिंग थी,जहां परीक्षा की तैयारी के साथ-साथ मेंहदी की डिजाइन भी डिस्प्ले होने लगती थी,फिल्मों का आलोचनात्मक विश्लेषण भी होता था और वो सारी गैरजरूरी बातें होती थीं,जिनका पढ़ाई और परीक्षा से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था।पढ़ाई से ज्यादा ध्यान इस बात पर होता था कि तेरे हाथों की मेंहदी ज्यादा लाल है कि मेरे हाथों की।कभी बीच में किसी सीनियर से या किसी पढ़ाकू दोस्त से डांट भी पड़ती थी तो दो पल के लिए ध्यान पढ़ाई पर लगाने की नाकाम कोशिश होती थी लेकिन फिर फ़ालतू बातों का कुछ अजीबोगरीब सिलसिला शुरू हो जाता था।मसलन,”यार मुझे तो काफ़ी पीने का मन हो रहा है,जा रही हूं बनाने,तू पियेगी? फिर एक दो आर्डर और मिल जाते और शुरू हो जाता था,चीनी और काफी पाउडर को गर्म पानी में फेंटने का सिलसिला। एक्जाम में कौफी बनाने वाली लड़की प्रधानमंत्री से ज्यादा इंपॉर्टेंट हो जाती थी।परीक्षा के दौरान "एक कप काफी मुझे भी प्लीज" वाला स्टेटमेंट ही इंटरनेशनल डिप्लोमेसी जैसा रुतबा रखता था।कौफी बनती,आपस के कुछ खास दोस्तों में बंटती, स्वाद और स्वास्थ्य पर चर्चा होती..फिर याद आता कि परीक्षा नजदीक है और फिर आरंभ होता ध्यान लगाकर पढ़ने का असफल सिलसिला–

“यार ये चैप्टर इंपॉर्टेंट है क्या?" 

"पिछले साल नहीं आया था।" 

"तो इस बार पक्का आएगा?" 

इस लॉजिक से तो पूरा सिलेबस इंपॉर्टेंट हो जाता है।क्या करें?बाप रे,इतना पढ़ना होगा,यार तू पढ़कर चैप्टर समझा दे न..” 

मतलब पढ़ाई छोड़कर हर काम करने में मन लगता था।कभी नोट्स मांगने कमरे- कमरे घूमती हुई लड़कियां दिखतीं तो उन पर ही चर्चा होने लगती तो कभी इम्पोर्टेंट टौपिक और गेसवर्क का सिलसिला चलता।अब नोट्स का कम्यूनिज्म भी समझिए।नोट्स का कम्युनिज्म यह होता था कि जिसका नोट्स अच्छा है,वो सबका है। निजी संपत्ति जैसी कोई चीज एक्जाम के समय में नहीं मानी जाती थी।बस, जिसके नोट्स पर कोई बढ़िया वाला स्टिकर लगा है, वो  सही सलामत वापस करना पड़ता था।

कभी सिलसिला चलता ग्रुप स्टडी का..तो,चार लड़कियां बैठतीं..दस मिनट पढ़ाई और पंद्रह मिनट डिस्कशन होता।अधिकतर टॉपिक होता," मैम ने उसको ज्यादा मार्क्स क्यों दिए", "कैंटीन वाले भैया छुट्टी पर क्यों है", "शादी के बाद पढ़ाई कैसे होगी",होने वाला पति कैसा होगा,उसने पढ़ाई रोक दी तो?वगैरह वगैरह ..फिर कोई एक बोलती, "पढ़ लें यार, टाइम वेस्ट हो रहा है।" सब सहमत हो जाती और फिर थोड़ी सी नजर किताबों पर भी डाल ली जाती थी।

कुछ ऐसे ही माहौल में पढ़ते हुए स्टडी टाईम समाप्त होता था। फिर, सोने और लाईट बंद करने की हिदायतें हमारी हौस्टल वार्डन,मैडम गोरेट्टी की तरफ से आने लगतीं।असल पढ़ाई और परीक्षा की असली तैयारी तो शुरू होती थीं,लाईट बंद होने के बाद। कौफ़ी बनाते- बनाते और मेंहदी की डिजाइन मिलाते-मिलाते हौस्टल का वैसा कोना पढ़ाई के लिए निश्चित कर लिया जाता था,जहां रात भर लाइट जलती रहती थी। ऐसी जगहों की चादर,दरी, रूमाल वगैरह बिछाकर पहले से बुकिंग कर ली जाती थी।कुछ जगहें सीनियर्स के लिए खास होती थीं और उन जगहों पर जुनियर्स का दावा अपराध माना जाता था। लेकिन,कई बार परीक्षा वाला भूत सीनियर्स और जूनियर्स के बीच की दोस्ती को कृष्ण-सुदामा जैसी दोस्ती भी बनवा देता था। कुछ लड़कियां कार्नर वाले टेबल के नीचे तो कुछ बाथरूम की जलती लाईट में नहाने वाले कमरे के बाहर के कारिडोर में चादर बिछाकर पढ़ाई में लग जातीं। कोई लड़की हाथ मुंह धोने बाथरूम की तरफ आती और बाकी की लड़कियों को पढ़ती हुई देखती तो कमरे में लौटने के बाद वह भी अपनी किताबें लेकर आ जाती और वहीं सबके साथ बैठकर पढ़ने लग जाती। यकीन मानिए, यही चोरी की पढ़ाई परीक्षा में सबसे ज्यादा काम आती थी क्योंकि जितनी सीरियसली हम सब छुपकर रात के अंधेरे में पढ़ लेते थे,उतनी गंभीरता स्टडी टाईम की पढ़ाई में तो कभी आती ही नहीं थी।उस वक्त तो गप्पें लड़ाना,काफी पीना,फिल्म की कहानियां डिस्कस करना जैसी बातें ही मजा देती थीं। सब्जेक्ट तो छुपकर पढ़ने से ही समझ आते थे।सच कहूं तो टेबल के नीचे बैठकर जितने प्वाइंट्स याद किये थे,वे सारे के सारे आज तक ज्यों के त्यों याद हैं।स्टडी टाईम या क्लास में पढ़ाये टापिक्स तो उस वक्त ही दिमाग में नहीं घुसते थे तो अब तो क्या ही याद रहेंगे।


कई बार मैडम गोरेट्टी रात में राउंड पर आतीं यह देखने कि सारी बत्तियां ठीक तरह से बंद हैं या नहीं, लड़कियां सो गयीं हैं या नहीं या परीक्षाओं के दिन हैं तो किसी को कुछ जरूरत तो नहीं..तो ऐसे सिचुएशन में टेबल के नीचे और बाथरूम के आसपास जो क्लास चल रही होती थी,वो एकदम से पलक झपकते किसी जादू की तरह गायब हो जाती थी। सीनियर्स अपनी जुनियर्स को बचातीं और जुनियर्स अपनी सीनियर्स को। दोनों के बीच गजब का तालमेल दिखता था।ऐसा प्रेम का दरिया बहता था दोनों के बीच कि कल तक जो सीनियर्स रैगिंग करने की वजह से खड़ूस लगा करतीं थीं,उनसे जुड़वां बहनों जैसा प्रेम हो जाता था..पल भर में वे वैम्प से निरुपा राय जैसी ममतामयी मां दिखने लग जाती थीं। सीनियर्स भी अपनी जुनियर्स लड़कियों पर अपनी दादागिरी भुलाकर खूब प्यार लुटातीं क्योंकि पकड़े जाने और सिस्टर के पास जाकर ब्लैकलिस्टेड होने का डर तो दोनों को था।सो,दिल खोलकर एक दूसरे को बचाती थीं।इसी बीच कुछ खाना-पीना भी चलता रहता था। कभी ठेकुआ बंटता,कभी मठरी,निमकी बंटती…अचार पर तो सबका हक होता ही था। वैसे  भी मां के हाथों बना अचार और घर से लायी हुई खाद्य सामग्री इमोशनल सपोर्ट के लिए सबसे जरूरी लगती थी। आखिर परीक्षा  जैसी जंग जो लड़नी होती थी।मन को भी मजबूती तो चाहिए ही न। 


हौस्टल के  कुछ कमरे बहुत बड़े-बड़े थे और उनके बाहर की लौबी में सुरक्षा और सुविधा की दृष्टि से रातभर लाईटें जलती रहती थीं।ऐसी लौबी हम परीक्षार्थियों का खास निशाना होती थीं।जब तक परीक्षायें चलतीं,रात के दो-तीन बजे तक यह जादुई गुरुकुल चलता और अगले दिन की परीक्षा के बाद फिर स्टडी आवर में वही गपशप शुरू हो जाती। कभी ऐसा भी होता कि लुकाछिपी वाली पढ़ाई के दौरान रात दो बजे किसी के कमरे से रोने की आवाज आती..सुनते ही खलबली मच जाती..सब भागकर उसके कमरे में  पहुंचतीं तो पता चलता कि बेचारी पूरा याद किया हुआ चैप्टर ही भूल गई है। फिर क्या  था..सब मिलकर उसे याद करातीं और अपना ही भूल जातीं।ऐसी ही अजीबोगरीब होती थी हमारी हौस्टल की परीक्षा वाली एकता।

एक्जाम के दिन सुबह वॉशरूम के बाहर लाइन में लगभग हर हाथ में एक पेपर दिखाई देता, जिसमें उस दिन होने वाले सब्जेक्ट के एग्जाम के लिए  प्वाइंट्स लिखे होते थे।भला हम पढ़ाकू लड़कियां टाईम थोड़े ही वेस्ट होने देतीं।कई दफा तो बाथरूम के अंदर से भी प्वाइंट्स रटने की आवाजें आती थीं।प्राइवेसी गई तेल लेने, पास होना ज्यादा जरूरी होता है।

एक्जाम वाले दिन की सुबह का तो क्या ही कहना,अजीब आलम रहता था।आधी रात के बाद से ही बाथरूम पर कब्जा शुरू..7 बजते बजते.. "मेरा टॉप कहां है, वही लकी वाला।" 8 बजे "कलम चल नहीं रही, किसी के पास एक्स्ट्रा है?" 8:30 पर सब एक दूसरे को देखकर बोलती हैं, "मेरा तो कुछ नहीं होना। इस बार तो लगता है फेल ही होना है।" और…रोना गाना जो भी हो,रिजल्ट लातीं सब उम्मीद से बेहतर।


क्या मजेदार दिन थे वे भी और कितने विश्वास से भरे होते थे हम सभी परीक्षार्थी। मुझे याद आता है उन्हीं वर्षों में रंगीन टीवी का नया-नया चलन शुरू हुआ था और बुधवार तथा शुक्रवार को रात आठ बजे चित्रहार दिखाया जाता था।नीचे के एक बड़े से हौलनुमा कमरे में टीवी लगता और हौस्टल की सूचना-बोर्ड पर हौस्टल कैबिनेट की तरफ से इत्तिला दे दी जाती थी।जिन लड़कियों के अगले दिन पेपर नहीं होते थे,वे बड़ी भाग्यशाली मानी जाती थीं।इसके विपरीत जिन लड़कियों के पेपर अगले दिन होते थे,उनका तो हाल मत पूछिए। त्याग करने की परंपरा हम में वहीं से आरंभ हुई थी शायद, जो आगे जाकर हमें ससुराल संभालने में काम आयी। चित्रहार वाले दिन तो सुबह से ही इंतजार शुरू हो जाता था।मन ही मन में हम निश्चित कर लेती थीं कि इम्पोर्टेंट टौपिक्स पहले ही पढ़ लेना है ताकि चित्रहार में जब हीरो गाने लगे कि कबके बिछड़े हुए हम आज कहां आके मिले..तो हम बगैर गिल्ट मन में लिए उसे निहारते हुए उसके सुर से सुर मिला सकें।ऐसे में कुछ ऐसी लड़कियां,जो चित्रहार देखने नहीं आतीं और ऊपर हौस्टल में बैठकर पढ़ती रहतीं,वो हम टीवी देखने वाली सभी लड़कियों को वैम्प जैसी लगतीं थीं... “ये क्या बात हुई,जरा टीवी देख ही लेंगे तो क्या हो जायेगा..इतना भी क्या पढ़ाकू बनना..अरे मनोरंजन भी बीच-बीच में जरूरी होता है, दिमाग को भी रिलैक्स कराना चाहिए,ऐसी भी क्या पढ़ाई करनी..” ऐसी ही कुछ बातें बोलकर खुद को टीवी देखने के लिए गिल्ट-फ्री करते थे हम। चित्रहार समाप्त होने पर जब वापस अपने रूटीन में लौटते और पढ़ती हुई लड़कियों को किताबों में ध्यानमग्न देखते तो जलन और चिंता से भर जाते।उस रात तो सपने में भी हमारे नंबर खराब ही आते थे और अपने अतिरिक्त वे सभी लड़कियां हमसे आगे निकलती हुई दिखतीं,जिन्हें हम समझते थे कि वो पढ़ाई में कुछ खास नहीं हैं। जब तक यह जलन और चिंता का भाव बना रहता तब तक तो पढ़ाई अच्छी हो जाती,पर ज्योंहि लगता कि अपनी तो तैयारी ठीक-ठाक है,त्योंहि अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना आकर हमसे गाने गंवाने लगते थे। ऐसे में कभी यदि हमारी हौस्टल सुपरिटेंडेंट,सिस्टर कैरल राउंड पर आ जातीं तो मजबूरन अमिताभ और विनोद को दिमाग से भगाकर कीट्स और वर्ड्सवर्थ की गुलामी करनी पड़ती थी। सिस्टर कैरल उन घड़ियों में ललिता पवार जैसी दबंग महसूस होती थीं।


इन्हीं अनुभवों से गुजरती हुई हम लड़कियों ने परीक्षाएं दीं और सफलता पायीं।

सच कहें तो परीक्षाएं तो बहाना हैं।असली तैयारी होती है एक दूसरे को संभालने की।कोई पैनिक करे तो "सब अच्छा होगा" बोलने की,कोई रात भर जागे तो उसके लिए चाय-कॉफी बनाने की,और रिजल्ट के दिन साथ रोने और साथ हंसने की और हर बात से बढ़कर,अपने हौस्टल में एक्जाम से पहले सभी का एक दूसरे के लिए हिम्मत बनने की।परीक्षा खत्म होते ही सबका पहला डायलॉग होता था," क्वेश्चन पेपर देखकर तो ऐसा लगा कि सब कुछ ही भूल गई।अगली बार से पक्का पहले से पढ़ूंगी।"


परीक्षाओं के वे दिन भी सचमुच कितने यादगार होते थे।वो कॉफी के मग, रंग-बिरंगे हाईलाइटर, चिपके हुए स्टिकी नोट्स और किताबों के ढेर जैसे हर कमरे की पहचान बन जाते थे।हम  सहेलियाँ मिलकर पढ़ने तो बैठतीं लेकिन, आधे घंटे बाद चर्चा का विषय बदलकर बचपन की यादें, छुट्टियों की योजनाएँ और पसंदीदा गाने हो जाते थे। फिर अचानक किसी को घड़ी दिखती “अरे! हमने पढ़ाई कब की?” रात गहराने पर हॉस्टल की गलियों में अजीब-सी ऊर्जा होती थी। कोई फार्मूले दोहरा रहा होता है, कोई आईने के सामने खड़े होकर उत्तर याद कर रहा होता, तो कोई अपनी दोस्त को पढ़ाते-पढ़ाते खुद ही नया अध्याय समझने लगता।सुबह परीक्षा के लिए निकलते समय सबके चेहरे पर एक जैसी मुस्कान और एक जैसा तनाव होता था। कोई कहती, “काश,जो पढ़ा है, वही आए,” तो कोई मन ही मन सोचती, “जो नहीं पढ़ा, बस वही न आ जाए!” परीक्षा समाप्त होते ही वही छात्राएँ जो कुछ घंटे पहले घबराई हुई थीं, हॉस्टल लौटते ही खिलखिलाकर हँसने लगतीं,“चलो, अब अगली परीक्षा की चिंता कल से करेंगे!”


यही तो हॉस्टल की खूबसूरती है—तनाव, दोस्ती, देर रात की पढ़ाई, साझा नोट्स, और उन यादों का खज़ाना जो परीक्षा खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक मुस्कान बनकर साथ रहता है।आज भी सभी अच्छी -अच्छी ओहदों पर रहकर अपने परिवार,समाज और देश की सेवा कर रही हैं परन्तु मेरा दावा है कि परीक्षाओं के उन दिनों को भूल नहीं पाती होंगी।आज उम्र के इस पड़ाव पर जब बच्चों को परीक्षाओं की वजह से परेशान होते या कभी ग़लत फैसले लेते हुए देखती और सुनती हूं तो अपने समय का सबकुछ एक फिल्म की तरह आंखों से गुजरने लगता है जब परीक्षायें हमारे लिए एक खूबसूरत अहसास होती थीं और परीक्षा का डर हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत।

                 ©अर्चना अनुप्रिया 

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sandhya m
sandhya m
9 minutes ago

Hostel life ka ek dum sateek aur sunder chitran

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