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"स्वतंत्रता या स्वच्छंदता.. आजादी?"

Writer: Archana Anupriya
Archana Anupriya
Aug 15
16 min read

Updated: Aug 16


“स्वतंत्रता या स्वच्छंदता..आजादी?”


हाल की कुछ घटनाओं ने समाज को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि स्वतंत्र देश में जो आजादी हम जीने की कोशिश कर रहे हैं वह सही रूप में हमारी स्वतंत्रता है या हमारी स्वच्छंदता..?कपड़ों में, बोलचाल की भाषा में, अमर्यादित व्यवहार में क्या हमारी आजादी झलकती है या हम बेलगाम और स्वच्छंद होने को अपनी आजादी समझ रहे हैं.. बिना यह सोचे कि इस तरह की गैरजिम्मेदार आजादी हमारे समाज के लिए घातक सिद्ध होने वाली है। विद्रोह,आंदोलन, व्यवस्था पर ऊंगली उठाना तो प्रजातंत्र की जरूरी शर्तें हैं परन्तु, अमर्यादित बोल और आचरण क्या हमारी स्वतंत्रता बताती है या हम गलत दिशा की ओर मुड़ रहे हैं? चैनलों पर दिख रहे इन अजीबोगरीब आचरणों ने मन को उद्वेलित किया कि पहले यह तो समझें कि आजादी, स्वतंत्रता और स्वच्छंदता एक ही हैं या इनके बीच कोई अंतर भी है। आजादी दिवस मना तो रहे हैं परन्तु यह भी जानना जरूरी है कि आजादी वास्तव में है क्या?और यह क्यों जरूरी है? या इसका स्वरूप बदल देने से भी आजादी बनी रहती है या उसे नियंत्रित करना जरूरी हो जाता है?

       

इन तीनों शब्दों—आजादी, स्वतंत्रता और स्वच्छंदता का अर्थ यों तो सुनने में लगभग एक जैसा लगता है,लेकिन इनके बीच बहुत गहरा अंतर है। इसे सरलता से समझने के लिए एक छोटी सी कहानी का सहारा लेते हैं..


कहानी..

एक बार एक राजा के महल में दो तोते रहते थे।पहला तोता,स्वतंत्र राजा का प्रिय था।राजा ने उसे सोने के बड़े से पिंजरे में रखा था।पिंजरे का दरवाजा हमेशा खुला रहता था।वह सुबह उड़कर बगीचे में जाता, फल खाता, दोस्तों से मिलता और शाम को वापस महल आ जाता।वह जानता था कि बगीचे के फूल नहीं तोड़ना है, बगीचे के माली को परेशान नहीं करना है। इसलिए सब उसे प्यार भी करते थे।यही स्वतंत्रता है,उड़ान भी, और मर्यादा भी।


दूसरा तोता है स्वच्छंद  

राजा ने उसे भी आजाद कर दिया। बोला, "जाओ, जहां मन करे उड़ो"। वह पहले दिन तो खुश हुआ। दूसरे दिन उसने बगीचे के सारे फूल तोड़ दिए और तीसरे दिन माली की टोपी चुरा ली।चौथे दिन दूसरे पक्षियों का खाना खा गया।पांचवें दिन सबने मिलकर उसे भगा दिया। अब वो भूखा-प्यासा इधर-उधर भटक रहा है।यही आजादी स्वच्छंदता है जो है बिना लगाम की आजादी।

 

कहानी का सार यह है कि स्वतंत्रता यानि खुले पिंजरे वाला तोता आजाद भी है और जिम्मेदार भी जबकि स्वच्छंदता या बिना सोचे उड़ने वाला तोता आजाद तो है पर,गैरजिम्मेदार है और इसीलिए अंतत: अकेला है और परेशान है। एक पंक्ति में इसे समझें तो स्वतंत्रता में ‘मैं’ के साथ ‘हम’ भी चलता है जबकि स्वच्छंदता में सिर्फ ‘मैं’ चलता है।

आज़ादी किसी भी बंधन से मुक्ति है अर्थात 

आज़ादी का अर्थ है किसी बाहरी बंधन,दबाव या गुलामी से मुक्त होना,जैसे,किसी देश का विदेशी शासन से मुक्त होना राष्ट्रीय आज़ादी है।किसी व्यक्ति को अपनी बात कहने,अपने जीवन के निर्णय लेने का अवसर मिलना भी आज़ादी है।आज़ादी कहती है कि मुझ पर कोई जबरन शासन न करे।लेकिन,आज़ादी केवल अधिकार देती है,वह यह नहीं बताती कि उस अधिकार का इस्तेमाल कैसे करना है।

स्वतंत्रता का मतलब अपने विवेक से जीना है।

स्वतंत्रता आज़ादी से एक कदम आगे की स्थिति है।स्वतंत्र व्यक्ति अपने निर्णय अपने विवेक, जिम्मेदारी और मूल्यों के आधार पर लेता है। वह किसी के दबाव में नहीं आता लेकिन, अपने निर्णयों के परिणाम की जिम्मेदारी भी स्वीकार करता है।उदाहरण के लिए,मुझे अपनी जिंदगी अपनी इच्छा से जीने की स्वतंत्रता है,लेकिन मेरी स्वतंत्रता वहाँ समाप्त हो जाती है जहाँ से दूसरे के अधिकारों का हनन शुरू होता है।इसलिए, यहां स्वतंत्रता में अधिकार के साथ उत्तरदायित्व जुड़ा हुआ है।


स्वच्छंदता बिना मर्यादा के मनमानी वाली स्वतंत्रता का नाम है।स्वच्छंदता में व्यक्ति अपनी इच्छा को सर्वोपरि मान लेता है और सामाजिक जिम्मेदारी,मर्यादा या दूसरे के अधिकारों की परवाह कम या बिल्कुल नहीं करता।स्वच्छंद व्यक्ति कह सकता है कि मैं जो चाहूँगा,वही करूँगा। मैं  आजाद हूं।मुझे किसी की परवाह नहीं,मुझे कोई नहीं रोक सकता।यहीं स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में सबसे बड़ा अंतर है।स्वतंत्रता में विवेक होता है जबकि स्वच्छंदता में मनमानी।

एक छोटी-सी मिसाल लें…..मान लीजिए एक सड़क है।आज़ादी है तो आपको उस सड़क पर चलने की अनुमति है;स्वतंत्रता है तो आप अपनी मंज़िल और रास्ता स्वयं चुनते हैं, लेकिन ट्रैफिक नियमों का पालन करते हैं।स्वच्छंदता है तो आप कहते हैं कि मुझे आज़ादी है और लाल बत्ती तोड़कर, गलत दिशा में गाड़ी चलाकर दूसरों की जिंदगी खतरे में डाल देते हैं।इसलिए देखा जाये तो स्वतंत्रता का अर्थ नियमहीनता कदापि नहीं है।


एक पंक्ति में अंतर समझें तो आज़ादी बंधन से मुक्ति है,स्वतंत्रता  विवेकपूर्वक अपने निर्णय लेने का अधिकार है जबकि स्वच्छंदता बिना जिम्मेदारी के अपनी इच्छा को सर्वोपरि मानना है और शायद सबसे सुंदर बात यह है कि आज़ादी हमें पंख देती है,स्वतंत्रता हमें दिशा देती है,और स्वच्छंदता दिशा भूल जाने का नाम है। देखा जाये तो समाज के स्तर पर यही अंतर बहुत महत्वपूर्ण है,एक स्वस्थ समाज केवल आज़ाद लोगों का नहीं, जिम्मेदार स्वतंत्र लोगों का समाज होता है।


अब प्रश्न यह उठता है कि आज चैनलों में बच्चों और बड़ों के जिस तरह के व्यवहार और बोल दिख रहे हैं,क्या उन्हें उनकी स्वतंत्रता मानी जाये या उनकी स्वच्छंदता?

ये बात आजकल काफी चर्चा में भी है। कुछ का कहना है कि यह आजादी उनका अधिकार है परन्तु, कुछ का मानना है कि वे अपनी मर्यादाएं लांघ रहे हैं जो देश और समाज के हित में नहीं है।अब जब स्वतंत्रता जिम्मेदारी वाली आजादी है और स्वच्छंदता बिना सोच-समझ की आजादी,तो ऐसी घटनाएं  किस वर्ग में रखी जायें?इसका जवाब स्थितियों के विश्लेषण से ही सामने आ सकता है।

समय बदला है और साथ ही बदला है समाज। तकनीकी क्रांति के इस दौर में हर बच्चे के पास तक वे सूचनाएं पहुंच रही हैं,जिनकी शायद उन्हें ठीक से मतलब भी पता नहीं है।इसका नतीजा यह हुआ है कि सबको अपने अधिकार का तो पता हो गया है,जो अच्छी बात है परन्तु,यह जागरूकता नहीं आयी है कि अधिकार का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कर्तव्य निर्वहन भी होता है। कर्तव्य के बिना अधिकार अराजकता फैला सकती है,इस बात पर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है।इसमें कोई संदेह नहीं है जेन जी के पास पहले से ज्यादा मौके और प्लेटफॉर्म हैं,तो लाइन कभी-कभी क्रॉस भी हो जाती है।लेकिन,जो आजादी स्वतंत्रता है,वह जिम्मेदारी भी लाती है,इस बात से अक्सर युवा अनभिज्ञ प्रतीत हो रहे हैं। शब्दों की मर्यादा लांघकर किसी के विषय में कुछ भी कहना,अपशब्दों द्वारा संवैधानिक पदों को अपमानित करना या अश्लील हरकतों से समाज के संस्कारों को शर्मिंदा करना स्वतंत्रता के वर्ग में कैसे रखा जा सकता है?यह या तो स्वतंत्रता के नाम पर स्वच्छंदता है या फिर कुछ बाहरी ताकतों द्वारा संचालित हमारे बच्चों को गुमराह करने की साज़िश।किसी भी तौर पर यह जागरूकता अभियान या स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति का नकारात्मक प्रभाव ही कहा जा सकता है। प्रजातंत्र में आवाज उठाने की आजादी आवश्यक है परन्तु निरंकुश नकारात्मक व्यवहार की नहीं क्योंकि यह संविधान और जागरूक व्यवस्था का अपमान ही है।

इसे निम्न उदाहरण से समझते हैं..

सोशल मीडिया और एक्सप्रेशन में स्वतंत्रता अपनी राय रखना, मीम बनाना, ट्रेंड फॉलो करना, खुद की पहचान बनाना है जैसे कोई क्रिएटर सोशल इश्यू पर रील बनाकर अवेयरनेस फैलाता है। परन्तु, वहीं स्वच्छंदता में ट्रोलिंग,कैंसिल कल्चर, किसी की पर्सनल लाइफ पर बिना फैक्ट के मीम और कमेंट आदि करना आता है ,जो आज धड़ल्ले से कोई भी कर रहा है।किसी भी सेलेब की एक पुरानी गलती का क्लिप काटकर 24 घंटे ट्रेंड चलाना, फिर माफी मांगने पर भी नहीं रुकना।यहां आजादी ‘बोलने की’ से ‘किसी को भी कुछ भी बोल देने की’ बन गई है,जो स्वतंत्रता नहीं, स्वच्छंदता है और रोकना जरूरी है।


करियर और लाइफस्टाइल के क्षेत्र में भी 

स्वतंत्रता है कि 9-5 जॉब न करके फ्रीलांस करें, डिजिटल नोमैड बनायें, अपने पैशन को करियर बनायें..जैसे,22 साल का लड़का YouTube और ब्रांड डील से कमाकर ट्रैवल कर रहा है, टैक्स भी भर रहा है। लेकिन,यह स्वतंत्रता स्वच्छंदता में तब बदलती है जब यह भाव हो कि मैं बॉस को रिपोर्ट नहीं करूंगा के नाम पर टीमवर्क, डेडलाइन, कमिटमेंट को इग्नोर करना आरंभ हो जाये।उदा हरण के लिए ग्रुप प्रोजेक्ट में ‘मेरा वाइब नहीं है’ कहकर काम बीच में छोड़ देना,और बाकी लोगों पर बोझ डाल देना। यहां आजादी अपना रास्ता चुनने की से जिम्मेदारी न लेने की बन गई है,जो बिल्कुल ही घातक है।

रिश्ते में भी स्वतंत्रता और बाउंड्री होनी चाहिए। स्वतंत्रता है कि डेटिंग में अपनी चॉइस, लिव-इन में बराबरी,’नो’ बोलने की हिम्मत हो।दोनों म्यूचुअल रिस्पेक्ट के साथ रिलेशन में हैं, ब्रेकअप भी इज्जत से कर रहे हैं। लेकिन,यह स्वच्छंदता में बदल जाता है जब मैं बंधन में नहीं बंधूंगा के नाम पर घोस्टिंग,लव-बॉम्बिंग, फिर बिना बात गायब हो जाना आदि  घटनाएं होती हैं।उदाहरण के लिए,हफ्ते तक रोज चैट-वीडियो कॉल, फिर अचानक ब्लॉक कर देना क्योंकि "फील नहीं आ रहा"। यहां आजादी "चॉइस की" से "दूसरे की फीलिंग की कदर न करने की" बन गई जो नकारात्मक स्थिति बताती है।यह स्वतंत्रता नहीं, स्वच्छंदता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है?

सबसे पहले तो इस बदले समय में सबको इंस्टेंट ही सब कुछ चाहिए।15 सेकंड की रील, 10 मिनट में डिलीवरी,छोटे,शार्ट कंटेंट..तो इस वजह से धैर्य और लॉन्ग-टर्म सोच कम हुई है। फिर,कोई रोक-टोक नहीं है।पहले घर, स्कूल,मोहल्ला टोकता था।अब तो बस फोन ही दुनिया है।You do yours  कल्चर ने सभी में घर कर लिया है।सेल्फ-लव अच्छी बात है,पर कई बार ये सिर्फ मैं बन जाती है,जो पूरी तरह से स्वार्थ है।लेकिन, पूरी तस्वीर में ये भी है कि जेन जी क्लाइमेट सिचुएशन,मेंटल हेल्थ,जेंडरइक्वालिटी जैसे दकियानूसी मुद्दों पर सबसे ज्यादा आवाज भी उठा रही है। वो सवाल पूछ रही है,जो पहले कोई नहीं पूछता था।ये ही स्वतंत्रता का सबसे पॉजिटिव रूप है।सीधी बात है कि स्वतंत्रता मतलब ‘मैं आजाद हूं और मैं जवाबदेह भी हूं’ है जबकि, स्वच्छंदता मतलब ‘मैं आजाद हूं, मुझे दूसरों से कुछ फर्क नहीं पड़ता’ है।देखा जाए तो,स्वतंत्रता एक भ्रम बन जाती है जब आजादी बेलगाम बन जाए।’मैं आजाद हूं’-- ये लाइन आज हर दूसरी रील, हर तीसरे स्टेटस में सुनाई देती है।आजादी अच्छी है क्योंकि बिना आजादी के तरक्की नहीं होती। परन्तु,दिक्कत तब आती है जब स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच की लाइन मिट जाती है।आज यही एक बड़ी भूल हो रही है - बेलगाम बोली,बेलगाम व्यवहार और अश्लील हरकतों को स्वतंत्रता का नाम दे देना नयी पीढ़ी की आजादी नहीं, उसकी सबसे बड़ी गलतफहमी है।बेलगाम बोली बेबाकी नहीं, बदतमीजी है।स्वतंत्रता है, अपनी राय रखना…सरकार, सिस्टम, ट्रेंड पर सवाल उठाना..असहमति जताना। उदाहरण के लिए,मुझे ये पॉलिसी गलत लगती है क्योंकि..."

स्वच्छंदता बन गई है,गाली,ट्रोलिंग,बॉडी- शेमिंग,किसी के माँ-बाप तक पहुंच जाना, कंट्रोवर्सी के नाम पर किसी की इज्जत उछालना। कमेंट सेक्शन में "तेरी शक्ल देख" से शुरू होकर पर्सनल अटैक पर खत्म।फर्क साफ है। स्वतंत्रता में तर्क है, स्वच्छंदता में सिर्फ शोर है। माइक मिल जाना आजादी है, माइक से गाली देना आजादी नहीं।बेलगाम व्यवहार कूल नहीं, गैर-जिम्मेदारी है।स्वतंत्रता है,अपने करियर,कपड़े,लाइफस्टाइल खुद चुनना,9-5 की गुलामी न करना बल्कि फ्रीलांसर होकर रात 2 बजे काम करना,पर डेडलाइन देना।स्वच्छंदता बन गई कि "मेरा मूड नहीं है" बोलकर टीम को धोखा देना,पब्लिक प्लेस में जरूरत से ज्यादा हंगामा करना,नियम तोड़कर उसे "विद्रोह" का नाम देना।मेट्रो में सीट के लिए लड़ना,फिर वीडियो डालकर लिखना "Rebel Mode On"आदि।स्वतंत्र इंसान नियम बनाता है। स्वच्छंद इंसान नियम तोड़ता है और फिर विक्टिम कार्ड खेलता है।अश्लीलता को "एक्सप्रेशन" कहना तो सबसे खतरनाक भूल है,जो नकारात्मक आजादी दिखा रही है।

स्वतंत्रता है अपने शरीर, अपनी पहचान, अपने प्यार पर हक,शर्म और पाखंड को तोड़ना,मेंटल हेल्थ, बॉडी पॉजिटिविटी पर खुलकर बात करना।

स्वच्छंदता बन गई है,व्यूज के लिए जानबूझकर अश्लीलता दिखाना,प्राइवेट को पब्लिक करना, "एक्सप्रेशन" के नाम पर वो सब करना जो घर में भी नहीं कर सकते,दस सेकंड का क्लिप वायरल करने के लिए सीमा लांघना, फिर पकड़े जाने पर "ये मेरी मर्जी है" कहना।यहां आजादी "खुद को जीने की" नहीं रही। ये "दूसरों का ध्यान खींचने की लत" बन गई है और इस लत की कीमत इज्जत,रिश्ते और मेंटल पीस से चुकानी पड़ रही है।

तो प्रश्न उठता है कि गलती कहां हो रही है? देखने पर पता चलता है कि हाल के दिनों में एल्गोरिदम का खेल चल रहा है।जो जितना एक्सट्रीम,वो उतना वायरल।तो,बच्चे सीख गए कि शोर मचाओ और वायरल हो जाओ।आज सभी अपने में व्यस्त हैं।कोई किसी को रोकने वाला नहीं.. घर,स्कूल,समाज की डांट कम हो गयी है और साथ में "गाइडेंस" भी कम हो गयी है।स्वतंत्रता बिना परिणाम की परवाह किए उपयोग हो रही है।जो मर्जी हो,वो करो,सोशल अकाउंट कैंसल कर देंगे तो बच्चे नया अकाउंट बना लेंगे। वे यह भूल जाते हैं कि असल ज़िंदगी में कभी कोई कैंसल का बटन नहीं होता,हर व्यवहार का परिणाम भुगतना पड़ता है।


 तो,बेहतर करने का रास्ता क्या है?

स्वतंत्रता को बचाना है तो उसे परिभाषित करना होगा।समझना होगा कि स्वतंत्रता मतलब मेरी आजादी + तुम्हारी इज्जत.. जैसे, सड़क पर गाड़ी चलाने की आजादी है,पर रेड लाइट तोड़ने की नहीं क्योंकि वहां से कोई और भी गुजरता है।नयी पीढ़ी सबसे तेज, सबसे जागरूक पीढ़ी है। उसने बहुत से पुराने ताले तोड़े हैं। बस अब ये समझना बाकी है कि ताला तोड़ना और दीवार गिरा देना- दोनों में फर्क होता है।आजादी जश्न मनाने के लिए है,अराजकता फैलाने के लिए नहीं।  

बोलो, जियो, बनो..पर इस शर्त पर कि तुम्हारी आजादी से किसी दूसरे की आजादी न छिने।तभी वो "स्वतंत्रता" कहलाएगी, वरना वो सिर्फ "शोर" रह जाएगी।

बेलगाम स्वतंत्रता तो हर  समाज के लिए एक धीमा जहर है।"मेरी मर्जी" जैसे दो शब्द जब जिम्मेदारी के बिना बोले जाएं,तो वो स्वतंत्रता नहीं होती बल्कि वो बेलगाम स्वतंत्रता बन जाती है और बेलगाम घोड़ा जितना तेज दौड़ता है,उतना ही ज्यादा नुकसान करता है।आज यही बेलगाम आजादी समाज की जड़ें खोखली कर रही है। ये एक दिन में नहीं दिखता,पर इसका असर धीरे-धीरे पूरे सिस्टम को खा जाता है। इससे भरोसा टूटता है,रिश्ते और समाज बिखरते हैं और यह याद रखना होगा कि समाज ईंट से नहीं,भरोसे से बनता है।जब "आजादी" के नाम पर घोस्टिंग, झूठ,पब्लिक शेमिंग, रिश्तों में कमिटमेंट का न होना आम हो जाए तो, लोग एक-दूसरे पर यकीन करना बंद कर देते हैं।नतीजतन,दोस्ती मतलबी, रिश्ते अस्थायी और परिवार सिर्फ "रहने की जगह" बनकर रह जाता है। एक ऐसा समाज जहां कोई किसी का साथ नहीं देगा। इससे सभ्यता खत्म होती है और जंगलराज लौट आता है। जबकि कानून और शिष्टाचार इसी लिए बने कि हम साथ रह सकें।इसी तरह जब बेलगाम बोली को "बेबाकी", ट्रोलिंग को "फ्री स्पीच" और पब्लिक में अश्लीलता को "एक्सप्रेशन" कह दिया जाए, तो मर्यादा की दीवार गिर जाती है।  नतीजतन,सड़क पर लड़ाई,ऑफिस में बदतमीजी, ऑनलाइन नफरत…फिर हर कोई चिल्लाता है, कोई सुनता नहीं। इसे ही अराजकता कहते हैं। मजबूत से कमजोर दबने लगता है।इससे युवा शक्ति बर्बाद होती है, देश का भविष्य कमजोर होता है।जेन जी ही देश का भविष्य है पर, अगर उसकी ऊर्जा दिशाहीन हो जाए तो?

जब सारी एनर्जी व्यूज, लाइक्स और वायरल होने में लग जाए और मेहनत,स्किल और अनुशासन को पुराना कहकर रिजेक्ट कर दिया जाए तो टैलेंटेड लोग शॉर्टकट में फंस जाते हैं, 5 मिनट की फेम के लिए 5 साल की मेहनत दांव पर लग जाती है और देश को डॉक्टर, इंजीनियर, टीचर कम और सोशल इन्फ्लुएंसर ज्यादा मिलने लगते हैं और प्रोडक्टिविटी गिर जाती है।यह मानसिक स्वास्थ्य की महामारी है और सबसे खतरनाक है।बेलगाम तुलना, बेलगाम एक्सपोजर, बेलगाम नफरत सोशल मीडिया पर 24x7 परफेक्ट लाइफ और परफेक्ट बॉडी का दबाव बनाते हैं।नतीजा यह कि एंग्जायटी, डिप्रेशन, अकेलापन आता है क्योंकि स्वच्छंदता अंदर से खोखला कर देती है। मतलब, बाहर शोर, अंदर सन्नाटा..अगली पीढ़ी के लिए कोई नक्शा नहीं बचता।

बच्चे बड़ों को देखकर सीखते हैं। लेकिन,जब वो बड़े को गाली देते,नियम तोड़ते,अश्लीलता को नॉर्मल करते देखें,तो वो क्या ही सीखेंगे?  उनके लिए तो गलत-सही का पैमाना ही खत्म हो जाएगा। फिर तो दस  साल बाद समाज और भी ज्यादा टूटा हुआ मिलेगा।


तो क्या व्यक्तिगत आजादी गलत है?

बिल्कुल नहीं।गलत है आजादी को जवाबदेही से अलग कर देना।सच्ची स्वतंत्रता का फॉर्मूला बहुत सिंपल है, “मेरी आजादी  मतलब मेरी पसंद + मेरी जिम्मेदारी + दूसरों का सम्मान।”आप तेज गाड़ी चला सकते हैं,पर रेड लाइट नहीं तोड़ सकते। आप कुछ भी बोल सकते हैं, पर किसी की इज्जत नहीं उछाल सकते। आप कुछ भी पहन सकते हैं, पर पब्लिक जगह की मर्यादा नहीं तोड़ सकते।

अंतिम बात,बेलगाम स्वतंत्रता समाज के लिए उतनी ही घातक है जितना कि बिना बांध के पानी। पानी जीवन है, पर बांध टूट जाए तो बाढ़ आ जाती है।हमें आजादी चाहिए पर ऐसी आजादी जो उड़ान दे,गिराए नहीं;जो बनाए,तोड़े नहीं;जो "मैं" के साथ "हम" को भी बचाए वरना एक दिन हम आजाद तो होंगे, पर रहने लायक समाज नहीं बचेगा।इस संबंध में पुरुष और महिला दोनों को ही शामिल करना आवश्यक है क्योंकि ये दोनों ही हमारे समाज और देश का अहम् हिस्सा हैं। आजकल लड़कियां भी बहुत तेजी से बढ़ती लापरवाही का हिस्सा होती दिखने लगी हैं।इस सवाल को समझदारी से देखना जरूरी है। लड़कियों को टार्गेट करने के बजाय बात बेलगाम स्वच्छंदता की होनी चाहिए,चाहे वो किसी भी जेंडर की हो। क्योंकि नियम और नतीजे सबके लिए एक जैसे ही होते हैं।


लड़कियों का जिक्र करें तो समाज में इसका असर अलग दिखता है क्योंकि लड़कियों से जुड़ी उम्मीदें, सुरक्षा और जिम्मेदारियां अलग तरह से जुड़ी हैं।यहां स्वच्छंदता का मतलब है  बिना मर्यादा,बिना सोचे, बिना परिणाम समझे किया गया व्यवहार।

समाज के स्तर पर देखें तो यह परिवार की इकाई कमजोर होना है।परिवार समाज की पहली पाठशाला है। जब रिश्तों में कमिटमेंट, सम्मान, भरोसा कम हो, तो तलाक, सिंगल पैरेंटिंग और अकेलापन बढ़ता है। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है।इसमें दोहरा मापदंड और रिएक्शन भी दिखता है।एक तरफ लड़कियों को बराबरी चाहिए, दूसरी तरफ कुछ केस में "आजादी" का मतलब "जवाबदेही नहीं" बन जाए तो समाज बैकलैश करता है। इससे असली फेमिनिज्म और बराबरी की लड़ाई भी बदनाम होती है।सुरक्षा का मुद्दा लें तो,सोशल मीडिया पर पर्सनल लाइफ, लोकेशन, अश्लील कंटेंट पब्लिक करना या एक्सप्रेशन के नाम पर खुद को एक्सपोज करना। इससे साइबर क्राइम, ब्लैकमेल, मेंटल हैरेसमेंट का खतरा बढ़ता है।लड़कियों के भविष्य के स्तर पर भी इसका प्रभाव दिखता है।इससे करियर और फोकस में भटकाव आता है। कुछ सेकंड की फेम के लिए पढ़ाई, स्किल, करियर को सेकेंडरी कर देना और बाद में रिग्रेट और फाइनेंशियल डिपेंडेंसी….मेंटल हेल्थ देखें तो लगातार तुलना, ट्रोलिंग, "परफेक्ट" दिखने का दबाव, एंग्जायटी, डिप्रेशन,बॉडी इमेज आदि इश्यू दिखते हैं।रिश्तों में भरोसा खत्म होता है।"यूज एंड थ्रो" कल्चर से लड़कियां खुद भी आहत होती हैं और परिवार भी टूटता है।लॉन्ग-टर्म साथी, भरोसे वाले रिश्ते बनाने में दिक्कत आती ही है।इसका मतलब ये नहीं है कि लड़कियों को आजादी नहीं मिलनी चाहिए। आजादी जरूरी है। घातक वो है जहां आजादी बिना सोचे कुछ भी करना हो जाये।


अब इसका समाधान क्या हो सकता है? 

समाधान रोकना नहीं, राह दिखाना है। समाधान डांटने या रोकने से नहीं निकलेगा। समाधान समझ, स्किल और सपोर्ट से निकलेगा।घर और परिवार का रोल महत्वपूर्ण है। अभिभावक को दोस्त और गाइड दोनों बनना पड़ेगा।बातचीत में "ये मत करो" की जगह "ये करने के ऐसे नतीजे हो सकते हैं" पर बात होनी चाहिए। सेक्स, रिश्ते, सोशल मीडिया पर खुली पर बिना जजमेंट वाली बात होनी चाहिए।बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं। घर में सम्मान, हदें, जिम्मेदारी दिखे तो बाहर भी वही दिखेगा।

शिक्षा का रोल "डिजिटल और भावनात्मक साक्षरता दोनों होनी चाहिए।स्कूल-कॉलेज में सिर्फ मैथ-साइंस नहीं,ये भी पढ़ाना होगा कि डिजिटल लिटरेसी क्या है?एक पोस्ट, एक रील का पांच साल बाद क्या असर होगा? प्राइवेसी,डेटा,साइबर सेफ्टी क्या है?भावनात्मक बुद्धिमत्ता,गुस्सा, अकेलापन कैसे हैंडल करें?ना कहना, बाउंड्री बनाना दोनों सिखाया जाना चाहिए।मीडिया साक्षरता सिखायी जाये।रील और रियल लाइफ में फर्क बतायें…बतायें कि वायरल होना सफलता नहीं है।लड़कियों का खुद का रोल सशक्त है  पर समझदार भी बनाया जाये।लक्ष्य वाली आजादी बतायें जिसमें ‘मैं आजाद हूं’ के साथ ‘मैं ये बनना चाहती हूं’ भी हो। करियर, स्किल, पैसा,...ये असली आजादी देते हैं।पीयर सपोर्ट हो।सहेलियां एक-दूसरे को वायरल कंटेंट के लिए उकसाने की बजाय, ग्रो करने में मदद करें।वे अपना रोल मॉडल बदलें..सिर्फ ग्लैमर नहीं, उन महिलाओं को फॉलो करें जिन्होंने मेहनत से कुछ बनाया है।ऐसे में समाज और प्लेटफॉर्म का रोल भी जरूरी है।

अल्गोरिदम जैसे प्लेटफॉर्म को भी जिम्मेदारी लेनी होगी। नफरत और अश्लीलता को बूस्ट करने की बजाय, क्वालिटी कंटेंट को बढ़ावा दें।कानून सख्त हो,साइबर बुली, डीपफेक, रिवेंज पोर्न पर सख्त और तेज कार्रवाई होनी चाहिए।

अंतिम बात करें तो लड़कियों की आजादी देश की तरक्की की निशानी है। डॉक्टर, पायलट, वैज्ञानिक, उद्यमी - ये सब उसी आजादी की देन हैं।खतरा तब है जब यह आजादी उनकी आत्म-सम्मान के साथ नहीं है।असली आजादी तो वो है जिसमें लड़की कह सके कि मैं अपनी जिंदगी के फैसले खुद लूंगी और उन फैसलों की जिम्मेदारी भी खुद लूंगी।रोकना समाधान नहीं है। समझदार बनाना समाधान है।

नकारात्मक स्वतंत्रता आजादी का गलत इस्तेमाल करता है।मतलब,"मुझे कोई रोके-टोके नहीं" वाली सोच, जिसमें जिम्मेदारी, मर्यादा और दूसरों का सम्मान नहीं है।इसे सुधारना मतलब "आजादी छीनना" नहीं है।मतलब है आजादी को समझदारी देना।


नकारात्मक स्वतंत्रता को सुधारने के कुछ उपाय..


शिक्षा में स्वतंत्रता और जिम्मेदारी दोनों पढ़ायी जाये..स्कूल-कॉलेज में सिर्फ अधिकार नहीं, कर्तव्य भी बताया जाये।हर सब्जेक्ट में एक अध्याय इस बात पर हो कि तुम्हारी आजादी कहां खत्म होती है।उदाहरण के लिए,फ्री स्पीच है, पर किसी की इज्जत उछालने की फ्री स्पीच नहीं है…अगर तुम इंस्टा पर ये पोस्ट करोगे तो तीन साल बाद क्या होगा?..घर में संवाद की दीवार गिरायी जाये ताकि बच्चे जो चाहें, बिना डरें कह सकें।रोक-टोक से बच्चे और ज्यादा बागी होते हैं।बच्चा कुछ नया करे तो डांटो मत,पूछो  कि क्यों करना है? इसके फायदे-नुकसान क्या हैं? जिम्मेदारी कौन लेगा?आदि।पेरेंट्स खुद उदाहरण बनें। आप फोन चलाते हुए "फोन मत चलाओ" बोलोगे तो बच्चा नहीं मानेगा।

डिजिटल साक्षरता पर काम करें।आज की आजादी 90% ऑनलाइन है। गुस्से या ट्रेंड में आकर कोई पोस्ट/कमेंट करने से पहले कुछ घंटे रुको,डिजिटल फुटप्रिंट वर्कशॉप में हर बच्चा जाने कि उसकी एक रील उसकी जॉब, शादी, इज्जत तय कर सकती है..प्लेटफॉर्म पर रिपोर्ट और ब्लॉक का सही इस्तेमाल सिखाएं।

बच्चों के रोल मॉडल बदलें।आज जो वायरल है वही आइडल बन रहा है। बच्चों को इस शोर से दूर करने की कोशिश करें। स्कूल में उन लोगों को बुलाएं जिन्होंने बिना शोर मचाए अपने और समाज के लिए कुछ बनाया,जैसे,डॉक्टर, उद्यमी, आर्मी ऑफिसर, टीचर आदि।मीडिया को भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए ताकि सकारात्मक कंटेंट ही बताया जाये।कंट्रोवर्सी के साथ क्रिएटिविटी को भी TRP दिया जाए।

कानून और परिणाम का डर भी जरूरी है।कुछ नहीं होगा वाली सोच सबसे खतरनाक है।  साइबर बुली, फेक न्यूज, पब्लिक में अश्लीलता आदि पर तेज और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। हां, पर सजा के साथ "सुधार" भी करें।पहली गलती पर काउंसलिंग और कम्युनिटी सर्विस दी जाये।उद्देश्य वाली आजादी दी जाये।खाली दिमाग शैतान का घर। खाली समय स्वच्छंदता का घर। युवाओं को स्किल, स्पोर्ट्स, वॉलंटियरिंग,स्टार्टअप में लगायें।जब आपके पास "बनाने" के लिए कुछ होगा तो "तोड़ने" का टाइम नहीं मिलेगा। सेल्फ - रिफ्लेक्शन की आदत डालें।सबसे बड़ा सुधार अंदर से आता है।व्यक्ति सोचे कि आज मैंने किसकी आजादी का सम्मान किया?आज मैंने कौन सा काम जिम्मेदारी से किया?क्या मेरा आज का काम कुछ सालों बाद भी मुझे गर्व देगा?

सबसे जरूरी बात है,संतुलन..आजादी और अनुशासन दुश्मन नहीं,दोस्त हैं।जैसे पतंग…डोर ढीली छोड़ दो तो उड़ते-उड़ते गिर जाएगी। डोर बहुत कस दो तो उड़ ही नहीं पाएगी।सही डोर है कि मैं आजाद हूं,और मैं जवाबदेह भी हूं। नकारात्मक स्वतंत्रता को डंडे से नहीं सुधारा जा सकता। उसे समझ,अवसर और उदाहरण से ही सुधारा जा सकता है।

अब सवाल यह है कि क्या अश्लील हरकतें और कपड़े "आजादी" का प्रतीक हैं? तो इसका सीधा जवाब है,नहीं। कपड़े और हरकतें आजादी का तरीका हो सकते हैं,प्रतीक नहीं।आजादी का प्रतीक संविधान, वोट, शिक्षा, नौकरी और "ना कहने का हक" है। कपड़ा और व्यवहार उस आजादी को जीने का एक हिस्सा हो सकता है, पूरी आजादी नहीं।कपड़े अभिव्यक्ति हैं, आजादी की परिभाषा नहीं…आजादी देती है,अपनी मर्जी से कपड़े चुनने का हक।कोई जींस पहने, कोई साड़ी, कोई शॉर्ट्स, कोई हिजाब। ये चॉइस का मामला है।यह स्वच्छंदता तब  बन जाता है,जब मकसद "खुद को कम्फर्टेबल महसूस करना" न होकर "ध्यान खींचना, उकसाना या शॉक करना" हो और वो भी बिना जगह-समय की मर्यादा सोचे।बीच पर बिकिनी नॉर्मल है पर क्लासरूम या मंदिर में वही जगह की मर्यादा तोड़ना है।कपड़ा आपकी आजादी दिखा सकता है, पर कपड़े से आजादी नहीं नापी जाती।एक ऑफिसर साड़ी में भी आजाद है, और शॉर्ट्स वाली लड़की भी आजाद हो सकती है अगर उसके पास पढ़ाई, पैसा और फैसला लेने की ताकत है।अब सवाल यह भी है कि अश्लील हरकतें एक्सप्रेशन हैं या मजबूरी?आत्म-सम्मान के साथ एक्सप्रेशन  

डांस, एक्टिंग, कला, बॉडी पॉजिटिविटी..अगर कोई बालिग है, अपनी मर्जी से कर रहा है, किसी को नुकसान नहीं पहुंचा रहा, तो ये उसकी व्यक्तिगत पसंद है।लेकिन,व्यूज, लाइक्स, फेम के लिए जानबूझकर अश्लीलता नशे में, दबाव में, या "कूल दिखने" के लिए की गई हरकत नकारात्मक स्वच्छंदता है।इसका असर  दो तरफा होता है। ऐसा करने वाले पर बाद में रिग्रेट, साइबर ब्लैकमेल,मेंटल स्ट्रेस आ जाता है और  लड़कियों की पूरी पहचान सिर्फ "शरीर" तक सिमट जाती है। फिर "सारी लड़कियां ऐसी होती हैं" वाला टैग लग जाता है।ये आजादी नहीं,ये एल्गोरिदम और ट्रेंड की गुलामी है।

असली आजादी को कपड़े से नहीं, इन चार चीजों से नापिए।असली आजादी का प्रतीक है,शिक्षा और स्किल,आर्थिक आत्मनिर्भरता, सुरक्षा और सम्मान के साथ जीना और ना कहने की ताकत। सिर्फ फॉलोअर्स बनाना,पापा/बॉयफ्रेंड के पैसे पर शॉपिंग,"हां" बोलकर बाद में पछताना, वायरल होने के लिए रिस्क लेना नकारात्मक आजादी है।

संतुलन वाली बात है कि जज मत कीजिए,बल्कि समझिए क्योंकि हर लड़की के हालात अलग हैं। किसी पर पारिवारिक दबाव है, कोई रिबेल कर रही है, कोई सच में फ्री है।

आज़ादी मतलब चॉइस + जिम्मेदारी है।आप जो भी पहनें, जो भी करें,उसके सवाल खुद से पूछिए - "क्या मैं सेफ हूं? क्या मैं इसे पांच साल बाद भी डिफेंड कर पाऊंगी? क्या इससे किसी की इज्जत को ठेस पहुंच रही है?" आदि।समाज का काम कपड़े नापना नहीं, सुरक्षित माहौल देना है। ताकि लड़की शॉर्ट्स में भी सेफ फील करे और बुर्के में भी सेफ फील करे।

निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं कि कपड़े और हरकतें आजादी का हिस्सा हो सकते हैं, स्वतंत्रता का सबूत नहीं।अगर कोई लड़की पढ़-लिखकर, कमा कर अपने फैसले खुद लेकर, सर उठाकर जी रही है तो वो फुल स्लीव में भी उतनी ही आजाद है जितनी स्लीवलेस में।और अगर कोई सिर्फ "आजाद दिखने" के लिए अश्लीलता कर रही है, तो वो असल में ट्रेंड की गुलाम है।

असली आजादी शोर नहीं करती। वो काम करके दिखाती है। इसीलिए जिम्मेदार बनें, कर्तव्य करें तभी अधिकार कै भी हकदार बनेंगे और जब हर व्यक्ति जिम्मेदारी से अपनी स्वतंत्रता का उपयोग करेगा तभी सही मायने में हम आजाद हो पायेंगे।

                     ©अर्चना अनुप्रिया 












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