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"बदल रहा है समय"

  • Writer: Archana Anupriya
    Archana Anupriya
  • Jan 1
  • 6 min read

Updated: Jan 7

“बदल रहा है समय..”


बदलाव प्रकृति का नियम है और समय के साथ बदलना जरूरी भी है।चीजें बदलती रहती हैं.. और बदलना अच्छा भी है क्योंकि समय के साथ चलना जरूरी है।अगर पीछे छूट गये तो या तो पीड़ा होगी या पीड़ा देने लग जायेंगे।भगवान ने भी इस बात पर जोर दिया है कि समय के लिए ,धर्म के लिए,अपने कर्म के लिए बदलना ही चाहिए।खुद भगवान भी अलग-अलग युग में रूप बदल-बदलकर आये। समय के हिसाब से ही ईश्वर भी अपने अवतार में बदलाव करके आये।त्रेतायुगीन अवतार में राक्षसों द्वारा फैलायी अव्यवस्था को दूर करने के लिए और  मर्यादा की स्थापना के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्र जी का रूप लिया तो द्वापर युग में छल प्रपंच और अन्याय को दूर करने तथा अपने अधिकार के लिए,अपने कर्म करने पर जोर देते हुए श्रीकृष्ण का पूर्णावतार लिया।श्रीराम ने जहां समाज में मर्यादा स्थापित करने हेतु मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में समाज को राजा,पति, पुत्र, शिष्य,मित्र,भाई- हर तरह की मर्यादा बतायी और बताया कि हर व्यक्ति का कर्तव्य क्या होना चाहिए, वहीं कृष्ण ने अपने पूर्णावतार में बताया कि अपने कर्म पर ध्यान रखना जरूरी है न कि उसके फल के लिए परेशान होना क्योंकि परिणाम तो इंसान के हाथ में है ही नहीं।”गीता” का ज्ञान देते हुए उन्होंने मनुष्य और उसकी चेतना के उत्थान के लिए रास्ता दिखाया और मानव-समाज को बताया कि उन्हें क्या नहीं करना चाहिए।जीवन का मूल स्वरूप बताते हुए और कर्म के सिद्धांत पर जोर देते हुए भगवान ने मनुष्य को उसकी आत्मा का सच बताया और जीवन जीने का विज्ञान दिया।कलिकाल में भी भगवान कल्कि के रूप में आज की हालात में जीवन-उत्थान के लिए नया रास्ता दिखाने वह नये रूप में अवतरित होंगे। इसीलिए जैसे-जैसे परिस्थिति बदलती है, ईश्वर भी उसी के अनुरूप स्वयं को बदल कर अवतरित होते रहते हैं।मूल रूप में एक ही कारण होता है और वह है, “धर्म की स्थापना”। यहां धर्म का मतलब किसी पंथ विशेष से नहीं है,जिसे आमतौर पर हम सबने धर्म का तमगा दे रखा है। धर्म का मतलब है किसी भी रचना या व्यक्ति का मूल कर्म,जिसके लिए उसकी उत्पत्ति हुई है। उदाहरण के लिए,आग का धर्म है जलना,वायु का धर्म है ठंडक और जरूरी प्राणवायु देना,धरती का धर्म है उत्पत्ति करना,रचना आदि।इसी तरह सृष्टि के हर प्राणी,हर वस्तु,हर रचना का एक धर्म अर्थात कर्म है और जब भी कोई रचना अपने धर्म से विलग होती है और उसकी अधार्मिक अधिकता से सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगता है तब उन्हीं धर्मों की पुनर्स्थापना के लिए ईश्वर अपना स्वरूप बदलकर धरती पर आते हैं।


हाल फिलहाल की कुछ घटनाएं बताती हैं कि भारतीय सामाजिक परिवेश में बड़ी तेजी से लोगों की सोच बदल रही है। वैसे तो हर नयी पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से अलग सोच रखती है, बदलाव लेकर आती है परंतु, अब जो बदलाव आ रहे हैं,यह तकनीकी आधुनिकीकरण, संकुचित वैश्वीकरण तथा हर सूचना तक लोगों की आसान पहुंच की वजह से कुछ अधिक तीव्र गति से आते हुए प्रतीत हो रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है मानो, हर चार-पांच महीने में दुनिया बदल रही है,तकनीक बदल रहे हैं,सोच बदल रही है। साल-दो साल छोटे भाई की सोच बड़े भाई से अलग होने लगी है। नतीजतन नयी पीढ़ी में अब दोहरी मानसिकता दम तोड़ने लगी है और नई पीढ़ी अपने वास्तविक और तार्किक स्वरूप में दिखने लगी है। कुछ लोगों के अनुसार नई पीढ़ी में रूखापन है,असभ्यता है, स्वार्थीपना है परंतु, सकारात्मक रूप में देखें, तो वह अधिकांशतः सीधी, साफ और सच्ची बात करने वाली पीढ़ी लगती है। हां, यह सही है कि वे सामने वाले की भावनाओं का ख्याल करके नहीं बोलते,परंतु, सच्ची बात कहते हैं, बनावटीपन का मुखौटा नहीं ओढ़ते और सच तो कड़वा होता ही है। उदाहरण के लिए, यदि हमारे बड़े यदि हमें कोई कार्य करने को कहते थे और हमें करने का मन नहीं होता था तो हम उन्हें ‘न’ नहीं कहते थे,कर देते थे परंतु,कार्य करते समय मन ही मन कई बार भुनभुनाते रहते थे–”कहां फंस गए यार इनके चक्कर में,उफ्फ कोई बहाना बनाकर भाग जाया जाए,जब देखो, कोई काम पकड़ा देते हैं”..वगैरह-वगैरह और बड़े बेमन से  कार्य पूरा करते थे…इतना ही नहीं,आगे से बचने के उपाय भी सोचते रहते थे।लेकिन, आज अगर आप नयी पीढ़ी को कोई काम बताएं और उनका मन नहीं है तो वे साफ-साफ आपके मुंह पर मना कर देंगे, झूठे नाटक कर अपने ऊपर बोझ नहीं लेंगे।हम भले सोचते रह जाएं कि आजकल की पीढ़ी बड़ी बदतमीज है,कामचोर है, जिम्मेदारी से भागती है लेकिन, वह सीधे मुंह पर खरा-खरा बोलने वाली पीढ़ी लगती है। नई पीढ़ी तो नयी पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी की सोच भी बदलती हुई दिख रही है।माता-पिता, भाई बहन, जीवनसाथी, बच्चों, दोस्तों से प्यार करने के बाद अब लोग खुद से प्यार करना सीख रहे हैं। उन्हें इस बात का एहसास हो चुका है कि दुनिया केवल उनके ही कंधों पर नहीं टिकी हुई है इसीलिए, सबका बोझ लेकर चलने की जरूरत नहीं है,स्वयं पर भी ध्यान देना सीखना चाहिए। इसीलिए सब अपनी रूचि और अपने शौक पर भी ध्यान देना सीख रहे हैं।फल वाले, दूध वाले, सब्जी वाले से अब लोग थोड़े पैसों के लिए बहस नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें पता है कि उन्हीं पैसों से उन गरीब मेहनतकशों के घर का भरण पोषण होने वाला है तो बहस क्यों करना। रिक्शावाले, टैक्सीवाले से भी अब थोड़े पैसों के लिए चिकचिक नहीं होती क्योंकि इस बात का एहसास है लोगों को कि इन पैसों के कम न करने पर उनके चेहरे पर मुस्कान आ जाएगी और शायद वह पहले के मुकाबले ज्यादा मेहनत करने लग जाएंगे।अब लोग पहले की तरह सबकी गलतियां बताकर उन्हें सुधारने या उनसे बहस करने में भी अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहते क्योंकि उन्हें यह एहसास होने लगा है कि सबको सुधारने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है,लोग अपनी गलतियों से खुद सीखेंगे। खुद के चेहरे की खूबसूरती,खुद के पहने कपड़ों पर अब लोग परेशान नहीं होते क्योंकि उन्हें पता लग चुका है कि उनकी खुशी, उनकी सोच उनके चेहरे और कपड़ों से ज्यादा मायने रखती है। विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में भी लोग अब ज्यादा प्रतिक्रिया देकर अपने ऊपर बोझ नहीं लेना चाहते क्योंकि उन्हें अपना कौशल पता है और गंदी राजनीति और बेकार की बातों से स्वयं को नकारात्मक नहीं करना चाहते। लोग अब यह भी सीख रहे हैं कि रिश्ते और भावनाएं टूटने पर डिप्रेशन में जाने से बेहतर है स्वयं से प्यार करना और खुद के ऊपर ध्यान देना। लोगों ने अब यह सोचना शुरू कर दिया है कि मुझे अब ऐसे जीना है जैसे हर पल मेरा आखिरी पल हो.. लोग बस वही करना चाहते हैं जो उन्हें खुशी देती है क्योंकि उनकी चेतना जानती है कि अपनी खुशी के लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार हैं,कोई और नहीं। स्वयं को प्रसन्न रखने की जिम्मेदारी लोगों के खुद की है और स्वयं को बदलने का श्रेय भी उनके खुद का ही है। 

हम बदल रहे हैं तकदीर, हम तोड़ रहे हैं जंजीर और स्वयं को प्रेरित कर रहे हैं कि हम अपने हिसाब से जिंदगी जिएं हालांकि, इस बदलाव के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के प्रभाव समाज में दिख रहे हैं।

सामाजिक परिवर्तन के सकारात्मक प्रभावों में जीवन-स्तर में सुधार, शिक्षा और कौशल का विकास, लैंगिक समानता, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ और तकनीकी प्रगति शामिल हैं, जिन्हें सबने बड़ी खुशी से जीवन का हिस्सा बनाया है जबकि नकारात्मक प्रभावों में सामाजिक अव्यवस्था, असमानता, पहचान का संकट, पर्यावरणीय प्रदूषण (जैसे औद्योगीकरण से), और युद्ध/असुरक्षा का खतरा (जैसे परमाणु हथियारों से) शामिल हैं, जो समाज में चुनौतियां पैदा करते हैं।

यह सच है कि सकारात्मक बदलाव से विकास में तेजी आती है,लोग स्वयं के ऊपर ध्यान देकर खुश रहने के लिए उत्साहित हैं परन्तु,यह भी सच है कि केवल खुद पर ध्यान देने से इंसान खुद में ही सिमटता जा रहा है जो इंसान के सामाजिक प्राणी होने पर प्रश्न खड़ा करता है।जब हम सामाजिक हैं तो स्वार्थी नहीं हो सकते और यदि अपने विषय में स्वयं नहीं सोचा तो कोई और तो नहीं ही सोचने वाला है।बड़ी पतली रेखा है अपने लिए सोचने और स्वार्थी होने में। इसीलिए अक्सर जो स्वयं के विषय में सोचने लगता है,स्वार्थी व्यक्ति की श्रेणी में आ जाता है।शिक्षा से नए कौशल, ज्ञान और विभिन्न संस्कृतियों की समझ भी बढ़ी है, जिससे आलोचनात्मक सोच और आपसी समझ बढ़ी है।प्रौद्योगिकी और विज्ञान के कारण जीवन प्रत्याशा बढ़ी है, बीमारियों का इलाज संभव हुआ है और जीवन आसान हुआ है।आधुनिक समाजों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों (जैसे नागरिक अधिकार, महिला अधिकार) को भी बढ़ावा दिया है।संचार और सूचना प्रौद्योगिकी ने अर्थव्यवस्था और आधुनिक समाज के निर्माण में मदद की है। सामाजिक आंदोलनों जैसे श्रमिक और नागरिक अधिकार आंदोलन ने समाज में समानता और न्याय लाया है।सामाजिक प्रभाव से सहयोग और लाभकारी व्यवहार को बढ़ावा मिल सकता है।परन्तु,ऐसे तेजी से बदलाव से सामाजिक संरचनाएं टूट सकती हैं, जिससे अव्यवस्था और संघर्ष पैदा हो सकते हैं।कुछ समूहों के लिए तो अवसर पैदा होते हैं,जबकि  अन्य अक्सर पीछे छूट जाते हैं, जिससे असमानता बढ़ती है।औद्योगीकरण और तकनीकी प्रगति से वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण होता है।परमाणु हथियार और साइबर युद्ध जैसी तकनीकी प्रगति से मानव सभ्यता के अस्तित्व का खतरा बढ़ा है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बढ़ने से सामुदायिक बंधन कमजोर हो सकते हैं और पहचान का संकट पैदा हो सकता है।सामाजिक दबाव से खतरनाक व्यवहार (जैसे नशीली दवाओं का उपयोग) फैल सकता है।देखा जाए तो, सामाजिक परिवर्तन एक जटिल प्रक्रिया है जो समाज को बेहतर और बदतर दोनों दिशाओं में बदल सकता है, जिसके लिए संतुलन और सही दिशा में प्रयास की आवश्यकता होती है। इसीलिए बदलाव जरूरी तो है, परन्तु साथ ही साथ यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि व्यक्ति इसकी नकारात्मक पहलुओं को आगे लेकर न बढ़े बल्कि अपना सामाजिक पहलू बरकरार रखकर स्वयं को और समाज को साथ-साथ आगे बढ़ाये।

            ©अर्चना अनुप्रिया 


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