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"रोपाई से विदाई तक: धान भी बदले घर,बेटी भी"

  • Writer: Archana Anupriya
    Archana Anupriya
  • 13 minutes ago
  • 5 min read

“रोपाई से विदाई तक: धान भी बदले घर, बेटी भी”


“बेटी और धान, दोनों ही लक्ष्मी हैं, दोनों ही सृष्टि का आधार हैं और दोनों की किस्मत लगभग एक सी है – जन्म एक जगह, जीवन दूसरी जगह”--यह कथन पुरबिया किसान जगेसर काका की है। सुनने में अजीब जरूर लगता है लेकिन उनकी बात सचमुच पते की है। धान का बीज जहां डाला जाता है, पौधा उगने पर उसे वहीं नहीं रहने दिया जाता। उखाड़कर नए खेत में रोप दिया जाता है। बेटी भी जिस घर में जन्म लेती है, ब्याह के बाद उसे नया घर बसाना पड़ता है। दोनों का घर बदलता है, पर मकसद एक ही रहता है — जीवन को आगे बढ़ाना।


किसान बीज को छिटकता है,छोटी सी क्यारी में, जिसे 'नर्सरी' कहते हैं। 20-25 दिन वहीं बीज अंकुराता है। माँ की गोद जैसी नर्म मिट्टी, पिता की उंगली जैसी सिंचाई। बेटी भी अपने घर की नर्सरी में पलती है। मां की लोरी, पिता का कंधा,भाई की शरारत।यहीं उसकी जड़ें मजबूत होती हैं। नर्सरी में भीड़ होती है, पर हर पौधे का ध्यान रखा जाता है। घर में भी बेटी को अन्य बच्चों के साथ पलने दिया जाता है।ऐसे में पौधे की तरह ही उसे भी खुला वातावरण चाहिए ताकि वह स्वस्थ रूप से बढ़े,उसे दबाया न जाए। तभी वो मजबूत बनेगी।20-25 दिन बाद किसान नर्सरी के पौधे को जड़ से उखाड़ता है ताकि उसे दूसरे अनुकूल जगह पर लगाया जाए। पौधा हिलता है, मिट्टी छोड़ने का दर्द सहता है,वहां से उखड़कर कहीं अन्य स्थान पर पनपने के लिए। यह देखकर ऐसा लगता है कि पौधा टूट जाएगा, किसान को भी संयम और सावधानी से यह कार्य करना पड़ता है लेकिन,कुदरत के पालक रूप का शायद यही तरीका है ,पौधा दूसरी जगह जाकर पुनः पनपता है।बेटी की विदाई भी उखड़ना ही है।एक घर से डोली उठती है,दूसरे घर में जाकर नयी सृष्टि को बसाने के लिए।कलेजा मुँह को आ जाता है। 20-25 साल की जड़ें एक झटके में उखड़ती हैं। अब देखिए,धान के पौधे और बेटी में फर्क क्या रहा…फर्क सिर्फ इतना ही है कि किसान पौधे को उखाड़ते वक्त सावधान रहता है कि जड़ न टूटे। परन्तु,समाज बेटी को उखाड़ते वक्त अक्सर उसकी पढ़ाई, सपने, पहचान की जड़ें तोड़ देता है। अक्सर यह कहा जाता है, "अब दूसरे घर की हो, सब भूल जाओ।" कृषि वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर रोपाई के वक्त जड़ टूट जाए तो पौधा मर जाता है। बेटी की जड़ — उसका आत्मविश्वास — टूटे तो जीवन मरणासन्न नहीं हो जाता है क्या?


अब दूसरी रोपाई होती है।पौधे के लिए नया खेत,बेटी के लिए नया आँगन।उखाड़े गए धान को किसान नए खेत में ले जाता है। कीचड़ में, लाइन से, करीने से फिर रोप देता है।दो से तीन दिनों तक पौधा मुरझाया सा लगता है लेकिन फिर जड़ पकड़ लेता है और हरियाने लगता है। कुछ महीने में वही खेत सोना उगलता है। बिल्कुल इसी तरह बेटी भी ससुराल जाती है,नए रिश्ते,नया घर,नया माहौल,नया परिवार। शुरू में सब अजनबी। बेटी भी थोड़ी मुरझाती है,रोती है फिर, धीरे-धीरे जड़ पकड़ती है। वही उस नये घर को संवारती है,वंश चलाती है।धान की खेती और बेटी की परवरिश की यों तो कोई तुलना नहीं, लेकिन देखें तो, पौधे के मामले में किसान जानता है कि दूसरी जगह रोपे बिना धान में बाली नहीं आएगी। नर्सरी में ही छोड़ दो तो पौधे कमजोर रह जाएंगे, पैदावार नहीं होगी। इसी तरह बेटी को भी उड़ान चाहिए। मायके में कैद रखेंगे तो उसकी क्षमता मुरझा जाएगी।उसे भी नया वातावरण,नया माहौल चाहिए, जहां उसका व्यक्तित्व,उसका स्त्रीत्व निखरे,फले,फूले।देखा जाये तो यह फर्क सिर्फ नजर और नजरिये का है।किसान जब पौधा उखाड़कर दूसरे खेत में लगाता है तो गर्व से कहता है, "फसल बढ़िया होगी" पर जब बेटी घर बदलती है तो कई लोग कहते हैं,"पराया धन थी,चली गई।" सोचिए, धान का पौधा भी तो ‘पराया’ हो जाता है दूसरी मिट्टी का परन्तु, किसान उसे अपना ही मानता है क्योंकि वह जानता है,वहीं धान पनपेगा और फिर इंसान का पेट भरेगा। बेटी भी तो दूसरा घर आबाद करती है,तो पराई कैसे हुई? वो तो दो-दो घरों की लक्ष्मी हुई।


पौधे की जड़ें जगह बदलने के बावजूद सलामत रहती हैं तभी तो फलदायी होती हैं।जड़ें वही हैं तो फल भी वही हैं। जगह बदलने से धान का DNA नहीं बदलता। नर्सरी का वही पौधा, नए खेत में भी वही स्वाद,वही पोषण देता है। ठीक उसी तरह बेटी भी मायके के संस्कार, शिक्षा, हिम्मत साथ ले जाती है। ससुराल की मिट्टी अलग हो सकती है, पर अगर जड़ें मजबूत हों तो वह वहां भी कल्पवृक्ष बन जाती है। इसलिए बुवाई से ज्यादा जरूरी है, नर्सरी की देखभाल। बीज अच्छा हो,नर्सरी में खाद-पानी ठीक मिले तो, पौधा कहीं भी रोप दो,लहलहाएगा ही। बेटी को बचपन में प्यार,बराबरी का दर्जा और पढ़ाई की खाद दो तो वो किसी भी आँगन को फलीभूत कर महका देगी।सच कहें तो हमें किसानों से सीखना चाहिए ।पौधे उखाड़ो तो जड़ बचाकर अर्थात विदाई करो,पर बेटी के सपनों की जड़ें मत काटो।

रोपाई से पहले जैसे नए खेत को तैयार रखा जाता है वैसे ही ससुराल को बहू के रूप में बेटी पाने के लिए तैयार रहना चाहिए- इज्जत, स्पेस और बराबरी के साथ।उसे सही वातावरण दें और पूरी तरह से ख्याल रखें।हमें तो बेटी का घर बढ़ने पर गर्व करना चाहिए।किसान कभी नहीं कहता "पौधा चला गया" बल्कि कहता है "फसल फैल गई"। हमें भी कहना चाहिए कि बेटी का परिवार बढ़ गया,न कि बेटी पराये घर चली गई। धान का पौधा और घर की बेटी — दोनों का घर बदलना कमजोरी नहीं, प्रकृति का नियम है। एक से खलिहान भरते हैं, दूसरी से संसार। जिस दिन समाज उखाड़ने और रोपने के दर्द को समझकर, दोनों को गर्व से अपनाएगा, उस दिन न खेत सूखेंगे,न कोख।

खेत बदलता है,आँगन बदलता है, पर जड़ें वही रहती हैं।बेटी ही संसार बनाती है, सृष्टि चलाती है।धान की खेती और बेटी की स्वस्थ परवरिश जरूरी है– दोनों जीवन के लिए, सृष्टि के लिए,ईश्वर के लिए अनमोल हैं।


धान भी घर बदलता है और विवाहोपरांत बेटी का भी घर बदलता है…” धान जब खेत में लहलहाता है, तो किसान की आँखों में सपने भी उसी के साथ झूमने लगते हैं। महीनों की मेहनत, पसीना और उम्मीदें उस हरियाली में बस जाती हैं। लेकिन जैसे ही धान पककर तैयार होता है, उसे काटकर घर लाया जाता है—खेत से खलिहान, और खलिहान से किसी और के घर तक। धान अपनी जन्मभूमि छोड़ देता है, ताकि किसी और का जीवन भर सके।कुछ ऐसा ही एक बेटी के साथ भी होता है।बेटी भी घर के आँगन में पनपती है—हँसी, किलकारियों और प्यार के बीच। वह अपने माँ-बाप की आँखों का तारा होती है। धीरे-धीरे बड़ी होती है, जिम्मेदारियाँ समझती है, सपनों को सँजोती है। लेकिन एक दिन, जब वह पूरी तरह श्री सृष्टि गढ़ने के लिए “तैयार” मानी जाती है, तो उसे भी अपने घर से विदा होना पड़ता है—एक नए घर, नए रिश्तों और नई जिम्मेदारियों की ओर।धान और बेटी… दोनों में एक अजीब-सी समानता तो है।धान खेत में उगता है, लेकिन उसका असली मूल्य तब समझ आता है जब वह किसी और की थाली में जाता है।बेटी घर में पलती है, लेकिन उसका जीवन तब नया अर्थ पाता है जब वह किसी और घर को अपना बना कर सृष्टि के लक्ष्य को पूरा करती है।


यदि देखा जाये तो, क्या सच में यह तुलना पूरी है?धान को कभी नहीं पूछा जाता कि वह कहाँ जाना चाहता है।लेकिन आज की बेटी से पूछा जाना चाहिए।धान को काटकर चुपचाप भेज दिया जाता है। परन्तु ,बेटी को विदा करते समय उसकी इच्छाएं, उसके सपनों और उसकी पहचान का सम्मान होना जरूरी है।

समय बदल रहा है। अब बेटियाँ सिर्फ “किसी और का घर बसाने” के लिए नहीं, बल्कि अपने सपनों को पूरा करने के लिए भी जीती हैं। वे जहाँ जाती हैं, वहाँ सिर्फ रिश्ते नहीं निभातीं, बल्कि अपने अस्तित्व की नई पहचान भी बनाती हैं।इसलिए, अगर धान घर बदलता है, तो वह जीवन देने के लिए बदलता है। इसीलिए अगर बेटी घर बदलती है, तो उसे अपने जीवन को चुनने और संवारने का अधिकार भी मिलना चाहिए।अंत में, बात सिर्फ इतनी है— धान और बेटी दोनों अनमोल हैं…लेकिन बेटी को “धान” समझकर नहीं, “स्वतंत्र व्यक्तित्व” मानकर सम्मान देना ही सच्ची प्रगति है।

अर्चना अनुप्रिया

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