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"लाइक के पीछे भागती जिंदगी,रील संस्कृति और बदलता समाज"

Writer: Archana Anupriya
Archana Anupriya
20 hours ago
13 min read


रील की दीवानगी..हम जी रहे हैं या दिखा रहे हैं ?

कुछ लिखूं,इससे पहले आज के घरों का एक माहौल देखते हैं..

रामू काका के घर आज बहुत दिनों के बाद नल में पानी आया था।पोतों ने कहा,"दादू, नाचो"।

काका ने घुटनों के दर्द में भी दो ठुमके लगाए।

पोता खुश नहीं हुआ,"अरे दादू, फिर से करो, लाइट अच्छी नहीं आई..कैमरा हिल गया।"

काका ने फिर नाच किया।पोता बोला,"एक बार और, इस बार गाना ट्रेंडिंग वाला लगाऊंगा।" पानी नाली में बह गया..बाल्टी खाली रह गई..हां,पर रील बन गई…237 लाइक्स।पोता खुश..

काका रात को बोले,"बेटा, पानी तो चला गया, रील से प्यास बुझेगी क्या?" पोते ने जैसे सुना ही नहीं, वो अगली रील स्क्रॉल करने में लगा रहा।


आज अमूमन हर जगह का यही हाल दिखाई दे रहा है।आज आदमी जिंदगी कम जी रहा है और उसे रिकार्ड ज्यादा कर रहा है। कोई खुशी आई..रील बनाओ..किसी तरह का दुःख आया,स्टेटस लगाओ..।मतलब,शादी हुई,रील.. बच्चा पैदा हुआ,रील..ब्रेकआप है तो रील..कोई बीमार पड़ा तो पहले कैमरा चालू करो फिर दवा खोजो.. समझ नहीं आता कि हम जीवन जी रहे हैं या उसे बस दिखा रहे हैं। तकनीक विकसित होने पर मोबाइल ने हमें दुनिया से जोड़ तो दिया, लेकिन कहीं-कहीं ऐसा भी लगता है कि उसने हमें अपने ही जीवन से दूर भी कर दिया है।कभी लोग किसी खूबसूरत दृश्य को देखकर ठहर जाते थे।उसे आंखों में संजोकर अंतर्रात्मा तक तृप्त होते थे,एक नयी ऊर्जा का संचार होता था और हम हर दिन भूल कर तरोताजा हो जाते थे।अब दृश्य सुंदर हो तो भी पहला विचार यह आता है कि इस पर रील अच्छी बनेगी।बारिश हो रही है तो छतरी से ज्यादा मोबाइल संभाला जाता है। सूर्योदय हो रहा है तो सूर्य को देखने से पहले कैमरा खोला जाता है।किसी की शादी में लोग दूल्हा-दुल्हन से ज्यादा यह देखने में व्यस्त रहते हैं कि उनकी अपनी वीडियो में वे कैसे दिखाई दे रहे हैं।रुककर सोचें तो यह समझ नहीं आता कि हम अपना जीवन जी रहे हैं,खुद का मनोरंजन कर रहे हैं या आभासी दुनिया जीकर अपनी ही चेतना से खिलवाड़ कर रहे हैं।अजीब तरह से व्यवहार बदल गया है सबका। हालांकि,यह बदलाव पूरी तरह गलत भी नहीं है।रील ने बहुत से लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच दिया है। किसी छोटे शहर का कलाकार, कवि, शिक्षक, नर्तक या कारीगर आज बिना किसी बड़े मंच के लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। व्यवसाय को ग्राहक मिल सकते हैं, सामाजिक संदेश फैल सकते हैं और ज्ञान भी आसानी से साझा किया जा सकता है। दरअसल,समस्या रील में नहीं है, समस्या तब शुरू होती है जब रील जिंदगी से बड़ी हो जाती है।जब व्यक्ति अपने अनुभव को जीने के बजाय उसे दूसरों को दिखाने के लिए जीने लगे, तब खतरा पैदा होता है।आज ‘लाइक’ खुशी का पैमाना बनता जा रहा है और ‘व्यूज’ आत्मविश्वास का प्रमाण। किसी को वीडियो पर दस हजार लाइक मिले तो उसे लगता है “मैं खास हूँ” और लाइक कम मिले तो मन पूछता है,“क्या मुझमें कोई कमी है?”यहीं से सोशल मीडिया मनोरंजन से आगे बढ़कर मनोविज्ञान को प्रभावित करने लगती है।सबसे चिंताजनक बात यह है कि दर्शक भी इस खेल का हिस्सा हैं।हम दूसरों की जिंदगी की छोटी-छोटी झलकियों को देखकर अपनी पूरी जिंदगी की तुलना उनसे करने लगते हैं। किसी का सुंदर घर, किसी की विदेश यात्रा, किसी की शानदार शादी, किसी का फिट शरीर और किसी की चमकदार जिंदगी देखकर हमें लगता है कि बाकी सब खुश हैं और सिर्फ हम ही पीछे रह गए हैं।जबकि रील जिंदगी का पूरा सच नहीं होती..वह जिंदगी का चुना हुआ कुछ सेकंड होती है।जिस व्यक्ति की मुस्कान देखकर हम ईर्ष्या कर रहे हैं, संभव है उसी क्षण कैमरा बंद होने के बाद वह अपने जीवन की किसी समस्या से जूझ रहा हो।इसलिए, सवाल यह नहीं है कि रील बनाना सही है या गलत बल्कि सवाल यह है कि क्या हम रील के मालिक हैं या रील हमारी मालिक बन चुकी है?तकनीक हमारे हाथ में रहे तो वह साधन है लेकिन,तकनीक हमारे दिमाग पर हावी हो जाए तो वह आदत है और जब आदत हमारे व्यवहार को नियंत्रित करने लगे, तो वह निर्भरता बन जाती है।हमें रील बनानी चाहिए लेकिन,अपने जीवन को ही रील नहीं बना देनी चाहिए।कभी-कभी मोबाइल नीचे रखकर बारिश को बारिश की तरह देखना चाहिए,बिना फोटो खींचे किसी के साथ हँसना चाहिए,बिना स्टेटस लगाए किसी की मदद करनी चाहिएऔर कभी ऐसी खुशी भी मनानी चाहिए जिसका कोई दर्शक न हो क्योंकि जीवन का सबसे खूबसूरत क्षण वह नहीं, जिसे हजारों लोग लाइक करें।सबसे खूबसूरत क्षण वह है जिसे जीते समय आपको कैमरे की जरूरत ही महसूस न हो।हमें यह याद रखना चाहिए कि यह रील कुछ सेकंड की होती है,लेकिन, जिंदगी पूरी उम्र की।

एक समय था जब जीवन के सुंदर क्षणों को हम अपनी स्मृतियों में संजोते थे। बारिश में भीगना अपने आप में एक अनुभव था, पहाड़ देखना अपने आप में एक रोमांच और परिवार के साथ बैठकर हँसना अपने आप में एक उत्सव। आज वही बारिश शुरू होते ही हाथ मोबाइल की ओर बढ़ता है और..“एक रील बनती है।” पहाड़ दिखाई देता है तो आँखें पहले दृश्य को नहीं, कैमरे को खोजती हैं। परिवार के साथ कोई विशेष अवसर हो तो बातचीत से पहले कैमरा चालू हो जाता है।मानो जीवन का हर क्षण तब तक अधूरा है, जब तक उसे रिकॉर्ड करके दूसरों को दिखा न दिया जाए।


यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है कि हम जीवन जी रहे हैं या जीवन का प्रदर्शन कर रहे हैं?रील संस्कृति आधुनिक समय की एक ऐसी वास्तविकता है,जिसे न तो पूरी तरह स्वीकार कर लेना उचित है और न पूरी तरह खारिज कर देना। यह तकनीक का स्वाभाविक विकास है, लेकिन उसका प्रभाव व्यक्ति और समाज के चरित्र पर किस दिशा में पड़ रहा है, यह विचार का विषय अवश्य है। देखा जाए,तो आज रील केवल मनोरंजन का विषय नहीं रही है।कुछ सेकंड की वीडियो ने आज संचार की पूरी भाषा बदल दी है।जिस व्यक्ति के पास बड़े मंच तक पहुँचने का कोई साधन नहीं था,आज वह अपने मोबाइल से अपनी प्रतिभा लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। किसी छोटे शहर का कलाकार, कवि, नर्तक, संगीतकार, शिक्षक, उद्यमी या गृहिणी—सभी को अपनी पहचान बनाने का अवसर मिला है।रील ने प्रतिभा को भौगोलिक सीमाओं से मुक्त किया है।ज्ञान को छोटे और सरल रूप में प्रस्तुत करने की सुविधा मिली है। सामाजिक जागरूकता के अभियान तेजी से लोगों तक पहुँचते हैं।छोटे व्यवसायों को प्रचार मिलता है। नए रोजगार और आय के अवसर पैदा हुए हैं।इस दृष्टि से रील संस्कृति को केवल पतन का प्रतीक मानना उचित नहीं होगा। सही तरीके से देखा जाए तो समस्या माध्यम में नहीं, माध्यम के अतिरेक में है।


रील संस्कृति का सबसे गहरा प्रभाव शायद व्यक्ति के मन पर पड़ रहा है।किसी पोस्ट पर कितने लाइक मिले? कितने लोगों ने वीडियो देखा? कितनों ने टिप्पणी की?ये संख्याएँ धीरे-धीरे व्यक्ति के आत्म-मूल्य से जुड़ने लगती हैं।बहुत सारे लाइक मिले तो खुशी। कम मिले तो निराशा।फिर व्यक्ति स्वयं से नहीं, दर्शकों से पूछने लगता है कि “मैं कैसा हूँ?”और उत्तर उसके भीतर से नहीं, मोबाइल स्क्रीन से आने लगता है।यहीं समस्या गंभीर हो जाती है।व्यक्ति का आत्मविश्वास यदि बाहरी स्वीकृति पर निर्भर होने लगे तो वह निरंतर दूसरों की प्रशंसा का भूखा हो जाता है।आज की डिजिटल दुनिया में एक युवा के सामने केवल सफल होने की चुनौती नहीं है बल्कि उसे सफल दिखाई देने की चुनौती भी महसूस होती है।रील हमें जीवन का एक चुना हुआ हिस्सा दिखाती है।सुंदर घर तो दिखता है,घर के भीतर का तनाव नहीं..विदेश यात्रा दिखाई देती है, उसके पीछे की आर्थिक कठिनाइयाँ नहीं..मुस्कुराता चेहरा दिखाई देता है,उसके पीछे का अकेलापन नहीं..सफलता दिखाई देती है,असफलताओं की लंबी कहानी नहीं।लेकिन देखने वाला अक्सर उस कुछ सेकंड की चमक की तुलना अपनी पूरी जिंदगी से करने लगता है।यहीं से असंतोष जन्म लेता है।उसे लगने लगता है कि सब आगे निकल गए, मैं ही पीछे रह गया।जबकि, वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर हम दूसरों की हाइलाइट्स की तुलना अपनी बिहाइंड द सीन्स से कर रहे होते हैं।यह तुलना विशेष रूप से युवा मन के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है,जो कतई सही नहीं कहा जा सकता।

रील संस्कृति ने हमारे सामाजिक व्यवहार में भी एक परिवर्तन किया है।पहले हम अच्छे कपड़े इसलिए पहनते थे कि हमें अच्छा लगे।अब अक्सर यह प्रश्न पहले आता है कि फोटो में कैसा लगेगा?घर सजाने से पहले कैमरे का एंगल सोचा जाता है। भोजन करने से पहले उसकी तस्वीर ली जाती है। यात्रा का उद्देश्य कभी-कभी यात्रा से अधिक उसका कंटेंट बन जाता है।होने से ज्यादा दिखने का महत्व बढ़ने लगता है। यह स्थिति उपभोक्तावाद को भी बढ़ावा देती है।हमें बताया जाता है कि खुश रहने के लिए क्या खरीदना चाहिए,कैसे दिखना चाहिए, कहाँ जाना चाहिए और किस तरह का जीवन जीना चाहिए पर गौर करने वाली बात यह है कि खुशी किसी फिल्टर से नहीं आती। फिल्टर तरीके को बदल सकता है,जीवन को नहीं।

अधिकांशतः क्षणों में हम परिवार में मौजूद होकर भी वहां नहीं होते।रील संस्कृति का यह एक और महत्वपूर्ण प्रभाव परिवार पर दिखाई देता है।एक कमरे में बैठे चार लोग और चारों अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त।शारीरिक दूरी नहीं है, लेकिन संवाद कम हो गया है।बच्चे माता-पिता को कम और स्क्रीन को अधिक देखते हैं। पति-पत्नी एक-दूसरे के साथ समय बिताते हुए भी अलग-अलग डिजिटल दुनिया में चले जाते हैं।परिवार का अर्थ केवल एक छत के नीचे रहना नहीं है।परिवार का अर्थ है,एक-दूसरे को सुनना, समझना और समय देना।यदि डिजिटल दुनिया हमारे वास्तविक रिश्तों से समय छीनने लगे तो हमें रुककर सोचना होगा।

लोगों में संवेदनशीलता का संकट भी उत्पन्न हो गया है।रील संस्कृति का सबसे चिंताजनक पहलू उस समय सामने आता है जब किसी की पीड़ा भी ‘कंटेंट’ बन जाती है।दुर्घटना हुई पर लोग मदद करने से पहले वीडियो बनाने लगते हैं।कोई व्यक्ति संकट में है तो मदद की जगह कैमरा पहले निकल आता है।किसी का निजी विवाद है तो वह सार्वजनिक मनोरंजन बनने लग जाता है।यह स्थिति हमें एक असहज प्रश्न के सामने खड़ा करती है कि क्या हम संवेदनशील दर्शक रह गए हैं या संवेदनशील मनुष्य भी हैं?तकनीक ने हमें घटनाओं को रिकॉर्ड करने की शक्ति दी है, लेकिन हमें यह विवेक भी विकसित करना होगा कि हर चीज रिकॉर्ड करने के लिए नहीं होती।कभी-कभी मोबाइल नीचे रखकर किसी की मदद करना ही सबसे बड़ी ‘वायरल’ मानवता है।

यह भी समझना जरूरी है कि रील स्वयं कोई सामाजिक बुराई नहीं है।एक अच्छी रील किसी को हँसा सकती है,कुछ सिखा सकती है, किसी प्रतिभा को मंच दे सकती है, किसी सामाजिक समस्या की ओर ध्यान खींच सकती है और किसी छोटे व्यवसाय को ग्राहकों तक पहुँचा सकती है।एक शिक्षक जटिल विषय सरल भाषा में समझा सकता है।एक कलाकार अपनी कला दुनिया के सामने ला सकता है।एक सामाजिक कार्यकर्ता किसी अभियान को जन-आंदोलन बना सकता है।एक सामान्य व्यक्ति भी अपनी रचनात्मकता से पहचान बना सकता है।इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि रील बंद होनी चाहिए या नहीं?प्रश्न यह है कि रील हमारे नियंत्रण में है या हम रील के नियंत्रण में हैं?

यदि व्यक्तित्व और समाज पर पड़ते सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव को देखें तो रील आज केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गई है। वह हमारे व्यक्तित्व, सोच, व्यवहार, रिश्तों और सामाजिक मूल्यों को प्रभावित करने वाली एक शक्तिशाली सामाजिक व्यवस्था बन चुकी है। कुछ सेकंड की वीडियो हमारे समय, ध्यान और भावनाओं पर इतना अधिकार कर चुकी है कि अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि रील हमारे जीवन को बेहतर बना रही है या हम धीरे-धीरे रील की दुनिया में जीने लगे हैं?सच्चाई यह है कि रील न तो पूरी तरह अच्छी है, न पूरी तरह बुरी। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसका इस्तेमाल साधन के रूप में करते हैं या अपनी पहचान का आधार बना लेते हैं।

व्यक्ति के व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है।रील ने अभिव्यक्ति के अवसरों को लोकतांत्रिक बनाया है। पहले अपनी प्रतिभा दिखाने के लिए मंच, संपर्क और संसाधनों की जरूरत होती थी। आज किसी छोटे शहर का कलाकार, कवि, शिक्षक, संगीतकार, गृहिणी या युवा अपने मोबाइल से दुनिया तक पहुँच सकता है।इससे व्यक्ति में आत्मविश्वास बढ़ सकता है,अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलता है, रचनात्मकता और नए प्रयोगों को प्रोत्साहन मिलता है,बोलने, प्रस्तुति देने और संवाद करने की क्षमता विकसित हो सकती है,नए कौशल सीखने की प्रेरणा मिलती है और व्यवसाय और व्यक्तिगत ब्रांड बनाने के अवसर मिलते हैं।कई लोगों के लिए सोशल मीडिया ने वह मंच उपलब्ध कराया है जो उन्हें पारंपरिक व्यवस्था में शायद कभी नहीं मिलता।

लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है।रील की दुनिया में सबसे बड़ा खतरा है,दिखने की इच्छा का जरूरत से ज्यादा बढ़ जाना।व्यक्ति धीरे-धीरे यह सोचने लगता है कि जो दिखता है वही महत्वपूर्ण है।फिर सुंदर दिखना, लोकप्रिय दिखना, सफल दिखना और खुश दिखना..वास्तव में खुश होने से ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगता है।लाइक और व्यूज व्यक्ति के आत्म-मूल्य का पैमाना बनने लगते हैं। कम प्रतिक्रिया मिलने पर निराशा और अधिक प्रतिक्रिया मिलने पर अहंकार पैदा हो सकता है।व्यक्ति वास्तविक जीवन की तुलना सोशल मीडिया की चमकदार दुनिया से करने लगता है। इससे असंतोष, हीनभावना, दिखावे की प्रवृत्ति और निरंतर मान्यता पाने की इच्छा बढ़ सकती है।सबसे खतरनाक स्थिति तब आती है जब व्यक्ति पूछना बंद कर देता है कि मैं वास्तव में कौन हूँ?और उसकी जगह पूछने लगता है कि लोग मुझे किस रूप में देखना चाहते हैं?

हालांकि,समाज पर सकारात्मक प्रभाव भी कम नहीं हैं।रील ने समाज में संवाद की गति को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया है।किसी सामाजिक समस्या, प्राकृतिक आपदा, भ्रष्टाचार, अन्याय या जनहित के मुद्दे पर जागरूकता कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुँच सकती है।इसके अतिरिक्त, सामाजिक जागरूकता,जैसे, स्वच्छता, शिक्षा, पर्यावरण, महिला अधिकार, सड़क सुरक्षा और अन्य सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता फैलाना आसान हुआ है।ज्ञान का प्रसार करना आसान हुआ है।कठिन विषयों को छोटे और सरल वीडियो में समझाया जा सकता है।इन प्रतिभाओं को मंच भी कहें तो ग़लत नहीं होगा।छोटे शहरों और सामान्य परिवारों से आने वाले प्रतिभाशाली लोगों को पहचान मिल सकती है। अब तो यह व्यवहार आर्थिक अवसर भी देने लगा है ।कंटेंट क्रिएशन, डिजिटल मार्केटिंग, ऑनलाइन व्यवसाय और विज्ञापन के माध्यम से रोजगार और आय के नए रास्ते खुले हैं।सामाजिक जुड़ाव बेहतर हुआ है।दूर रहने वाले लोग भी एक-दूसरे के जीवन से जुड़े रह सकते हैं।इस दृष्टि से देखें तो रील आधुनिक समाज का एक लोकतांत्रिक संचार माध्यम भी है।

लेकिन, यही माध्यम समाज के सामने कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी लेकर आया है।दिखावे की संस्कृति पनप गयी है।रील संस्कृति ने होना से ज्यादा दिखन महत्वपूर्ण बना दिया है।घर छोटा हो तो भी वीडियो में बड़ा दिखना चाहिए।जीवन सामान्य हो तो भी उसे असाधारण दिखाना चाहिए।खुशी वास्तविक हो या न हो, कैमरे के सामने मुस्कान जरूरी है।इससे समाज में दिखावे और उपभोग की संस्कृति मजबूत हो सकती है।निजी जीवन का सार्वजनिक प्रदर्शन भी ठीक नहीं लगता।पहले निजी जीवन की कुछ सीमाएँ होती थीं। अब रिश्ते, झगड़े, प्रेम, पारिवारिक समारोह और व्यक्तिगत भावनाएँ तक सार्वजनिक सामग्री बनती जा रही हैं।जिस बात को कभी परिवार के चार लोग जानते थे, आज उसे हजारों या लाखों लोग देख सकते हैं।निजता धीरे-धीरे मनोरंजन में बदल रही है।छोटी-छोटी और लगातार बदलती वीडियो हमारे मस्तिष्क को तेज उत्तेजना की आदत डाल सकती हैं। परिणामस्वरूप किताब पढ़ना, लंबे समय तक किसी विषय पर विचार करना या बिना मोबाइल के शांत बैठना कठिन लग सकता है।समाज में धैर्य से अधिक तात्कालिक मनोरंजन की मांग बढ़ रही है।वास्तविक और आभासी जीवन के बीच का अंतर संदेहास्पद सा हो गया है।रील में हर कोई सफल, सुंदर, खुश और रोमांटिक दिखाई दे सकता है।लेकिन वास्तविक जीवन में संघर्ष, असफलता, बीमारी, अकेलापन और जिम्मेदारियाँ भी होती हैं।जब युवा लगातार दूसरों की ‘संपादित जिंदगी’ देखते हैं तो वे अपनी वास्तविक जिंदगी से असंतुष्ट हो सकते हैं। सामाजिक संवेदनशीलता का क्षरण होने लगा है।कभी किसी दुर्घटना को देखकर लोग मदद के लिए दौड़ते थे। आज कुछ परिस्थितियों में पहले मोबाइल कैमरा निकल आता है।दूसरे के दुख को दृश्य सामग्री में बदल देने का खतरा बढ़ गया है।यह प्रश्न स्वस्थ समाज के लिए बहुत गंभीर है।समझ नहीं आता कि क्या हम संवेदनशील समाज बन रहे हैं या केवल अच्छे दर्शक?एक ही कमरे में बैठे चार लोग चार अलग-अलग स्क्रीन पर व्यस्त हैं।बातचीत कम होती है।साझा समय घटता है।बच्चे माता-पिता से कम और स्क्रीन से अधिक सीखने लगते हैं।इससे परिवार में शारीरिक निकटता तो रहती है, लेकिन भावनात्मक दूरी बढ़ सकती है।

रील को खत्म करना समाधान नहीं है और न ही यह संभव है।समाधान है डिजिटल विवेक।हमें बच्चों और युवाओं को केवल यह नहीं सिखाना चाहिए कि मोबाइल कैसे चलाना है; उन्हें यह भी सिखाना चाहिए कि मोबाइल को कब बंद करना है।हमें यह समझना होगा कि हर खुशी को पोस्ट करना जरूरी नहीं..हर दुख को दिखाना जरूरी नहीं..हर उपलब्धि को साबित करना जरूरी नहीं..हर क्षण को रिकॉर्ड करना जरूरी नहीं।कुछ क्षण केवल हमारे लिए होते हैं।किसी पहाड़ को देखकर उसे कैमरे में कैद करने से पहले उसे आँखों में कैद करना चाहिए।किसी मित्र के साथ बैठकर पहले उससे बात करनी चाहिए, फिर उसकी तस्वीर लेनी चाहिए।परिवार के साथ भोजन करते समय पहले परिवार को देखना चाहिए, स्क्रीन को नहीं।अंततःरील आधुनिक जीवन की वास्तविकता है। वह अवसर भी है और चुनौती भी।उसने साधारण व्यक्ति को असाधारण पहुँच दी है, लेकिन उसी के साथ उसने व्यक्ति को दूसरों की स्वीकृति का भूखा भी बना दिया है।

इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि रील सही है या गलत?बल्कि सवाल होना चाहिए कि क्या रील मेरे जीवन का हिस्सा है, या मेरा जीवन ही रील का हिस्सा बन गया है?क्योंकि जब हम अपने जीवन को जीने के बजाय उसे लगातार दूसरों को दिखाने लगते हैं, तब कहीं न कहीं हम दर्शकों के लिए जीने लगते हैं और अपने लिए जीना भूल जाते हैं।रील बनाइए, प्रतिभा दिखाइए, समाज से जुड़िए लेकिन अपनी वास्तविक जिंदगी की कीमत पर नहीं..क्योंकि जिस जिंदगी को जीने के लिए कैमरे की जरूरत नहीं पड़ती,वही जिंदगी शायद सबसे खूबसूरत रील है। रील की भूमिका संतुलित हो,रील से दूरी विवेकपूर्ण हो। रील आधुनिक तकनीक की देन है इसलिए, उसे पूरी तरह नकारना न व्यावहारिक है और न आवश्यक। समस्या रील में नहीं, बल्कि उसके अतिरेक और अनियंत्रित उपयोग में है।जिस प्रकार भोजन जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन अति भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है, उसी प्रकार डिजिटल माध्यम भी आवश्यक हो सकते हैं, लेकिन उनका अतिरेक व्यक्ति के समय, ध्यान और मानसिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।इसलिए हमें “रील विरोधी नहीं बल्कि “रील विवेकी” समाज बनाने की जरूरत है।

कुछ व्यवहारिक सुझाव..

रील देखने का समय निर्धारित करें,सुबह उठते ही और सोने से पहले रील न देखें। हर खाली क्षण को मोबाइल से न भरें..दर्शक से अधिक सृजनकर्ता बनें।लाइक को अपनी कीमत न बनने दें.. निजी जीवन की सीमाएँ तय करें। हर पारिवारिक घटना, रिश्ते, यात्रा, व्यक्तिगत समस्या या भावनात्मक क्षण को सार्वजनिक करना आवश्यक नहीं।कुछ यादें केवल याद रहने के लिए होती हैं, पोस्ट होने के लिए नहीं।वास्तविक रिश्तों को प्राथमिकता दें।परिवार के साथ भोजन, मित्र से बातचीत, बच्चों के साथ खेलना और बुजुर्गों के साथ समय बिताना—इन क्षणों को मोबाइल स्क्रीन से अधिक महत्व दें।बच्चों को केवल यह कह कर कि मोबाइल मत चलाओ, समस्या हल नहीं होगी।माता-पिता स्वयं यदि हर समय मोबाइल में व्यस्त रहेंगे तो बच्चे से डिजिटल अनुशासन की अपेक्षा करना कठिन होगा।घर में इस संबंध में कुछ सरल नियम बनाये जायें तो स्थिति संभल सकती है। डिजिटल साक्षरता को केवल तकनीक चलाने की शिक्षा तक सीमित नहीं रखना चाहिए। लोगों को यह भी समझना चाहिए कि एल्गोरिद्म कैसे काम करते हैं, भ्रामक सामग्री कैसे पहचानी जाए, निजी जानकारी कैसे सुरक्षित रखी जाए और डिजिटल लत से कैसे बचा जाए आदि।स्कूलों और कॉलेजों में Digital Well-being और Media Literacy को व्यवहारिक शिक्षा का हिस्सा बनाया जा सकता है।बच्चों के लिए आयु-उपयुक्त सुरक्षा, गोपनीयता और अभिभावकीय नियंत्रण को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए।एक सरल डिजिटल अनुशासन अत्यावश्यक है।यही शायद रील संस्कृति का सबसे संतुलित रास्ता है।

रील को दोष देना आसान है, लेकिन असली चुनौती अपने व्यवहार को नियंत्रित करना है।तकनीक को पीछे नहीं ले जाया जा सकता। हमें उसके साथ आगे बढ़ना है लेकिन, यह सुनिश्चित करते हुए कि तकनीक हमारी सुविधा बने, हमारे व्यक्तित्व की स्वामिनी नहीं।हमें ऐसी पीढ़ी चाहिए जो कैमरे के सामने सहज हो, लेकिन कैमरे के बिना भी खुश रह सके..जो सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हो सकती है, लेकिन अपनी आत्म-मूल्य की पहचान लाइक्स से न करे..जो दूसरों की जिंदगी देखे, लेकिन अपनी जिंदगी जीना न भूले।आखिरकार,रील जिंदगी का हिस्सा हो सकती है,लेकिन जिंदगी को रील बनने से बचाना हमारी ही जिम्मेदारी है। इसे समाज का रोग नहीं,समाज का उपयोगी तकनीक बनाना है।कभी कैमरा उठाइए,कभी मोबाइल रख दीजिए।कभी दुनिया को दिखाइए कि आप क्या कर रहे हैं, और कभी चुपचाप वह कीजिए जिसे दिखाने की जरूरत ही नहीं क्योंकि जीवन का सबसे मूल्यवान क्षण वह नहीं जिसे सबसे ज्यादा लोगों ने देखा बल्कि वह है जिसे हमने पूरी तरह जिया।

©अर्चना अनुप्रिया

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