"हिंग्लिश का दौर है ब्रो.."

“हिंग्लिश का दौर है ब्रो..”
आजकल अक्सर लोगों को, विशेषकर नयी पीढ़ी को कहते सुना जाता है..”हे ब्रो,चिल करो यार..हे सिस, तेरे एक्जाम की प्रीपेयरेशन कैसी चल रही है..वगैरह वगैरह..एक पंक्ति में हिंदी और अंग्रेजी..दोनो मिक्स..कुछ अजीब सा ही रूप लेकर बोली जा रही है आज की बोलचाल की भाषा। भाषाओं की खिचड़ी सी बन गयी है,पर मजे की बात है कि सभी बोल रहे हैं,समझ रहे हैं और एक नयी भाषा का गढ़न तेजी से हो रहा है।सच कहें तो कोई भी भाषा कभी स्थिर नहीं रहती। वो नदी की तरह बहती है और रास्ते में जो भी रंग मिले, उसे अपना लेती है। आज के दौर में वो रंग है — हिंग्लिश का।
अब प्रश्न यह है कि यह हिंग्लिश है क्या? तो यह है, हिंदी + इंग्लिश = हिंग्लिश…यानी अपनी भावनाओं को बिना हिंदी या अंग्रेजी किसी भी भाषाई बाधा के बिना प्रेषित करना।जब हम “मुझे मीटिंग अटेंड करनी है,वरना बॉस इश्यू क्रिएट कर देगा” बोलते हैं, तो समझो हिंग्लिश के दौर में जी रहे हैं। ये न पूरी हिंदी है, न पूरी अंग्रेजी। ये दोनों का वो मिक्स असर है जो जुबान पर चढ़ जाए और दिल तक उतर जाए।अब प्रश्न उठता है कि भाषा का यह दौर आया कैसे?
90s में केबल टीवी आया, फिर कॉल सेंटर, फिर सोशल मीडिया और अब रील्स। अंग्रेजी रोजगार की भाषा बनी, हिंदी दिल की। दोनों की जरूरतों ने एक तीसरी भाषा को जन्म दिया — जो ऑफिस में भी चले और घर में भी। पहले लोग शर्माते थे, “अंग्रेजी नहीं आती”। अब गर्व से कहते हैं, “भाई, मेरा हिंग्लिश वाला वर्जन सुन”।
यह हिंग्लिश वाली भाषा इतनी लोकप्रिय हो गयी है कि अब लगभग हर जगह यही भाषा राज कर रही है। उदाहरण देखिए..
विज्ञापन में “ठंडा मतलब Coca-Cola”, “Daag अच्छे हैं” — क्योंकि ब्रांड जानते हैं कि प्योर हिंदी भी नहीं बिकती,प्योर इंग्लिश भी नहीं.. लेकिन यह हिंग्लिश हर प्रांत को समेट लेगी।
फिल्मी दुनिया अब बॉलीवुड है। जहां हिंग्लिश की जड़ें मजबूती से खड़ी हैं….“तुम्हारा सेंस ऑफ ह्यूमर अमेजिंग है यार” — डायलॉग अब डिक्शनरी से नहीं, गलियों से उठते हैं।
कोर्ट से कॉरपोरेट तक हिंग्लिश का बोलबाला दिखता है।जज साहब भी बोल देते हैं, “Next date दे रहे हैं, लेकिन कोशिश करो matter सेटल हो जाए”....व्हाट्सएप चैट पर मम्मी भी लिखती है, “बेटा, टाइम से खाना खा लेना, ओके?”
अब सवाल है कि इस तरह की भाषा के फायदे क्या-क्या हैं? कुछ फायदा है भी या हम यूं ही बिना अक्ल के नकल में बढ़ते हुए अपनी भाषा बिगाड़ रहे हैं।देखा जाए तो सबसे बड़ा फायदा तो आसान कम्युनिकेशन का है।कम्युनिकेशन फास्ट हो गयी है।भाव हिंदी का, टेक्निकल शब्द इंग्लिश के…बात सबको जल्दी समझ में आ जाती है।
बातचीत में शर्म खतम…अंग्रेजी न आने का कॉम्प्लेक्स गया। अब सब बोलते हैं और अपने-अपने स्टाइल में बोलते हैं।कहीं यह भाषा कल्चरल ब्रिज भी बनाती दिख रही है..जैसे,NRI बच्चा दादी से कनेक्ट कर पाता है, “दादी, ये वाला आचार too good है”। मतलब दादी और पोते दोनों की भावनाओं का आसान प्रेषण,जो दोनों को खुश कर रहा है।
अब इसके नुकसान भी समझिए।
कई बार हम न हिंदी के रहते हैं न इंग्लिश के। “मेरे को” वाली हिंदी और “He don’t know” वाली इंग्लिश– मतलब कोई भाषा सही नहीं बोल रहे यानि दोनों तरफ से कमजोर।
शुद्ध साहित्य, कोर्ट की भाषा, रिसर्च पेपर — वहाँ हिंग्लिश काम ही नहीं आती। और नई पीढ़ी प्रेमचंद पढ़े तो पूछती है, “भैया, ये ‘उधरना’ मतलब?”
तो भाई,अब आगे क्या करना चाहिए? तो हुजूर,
हिंग्लिश को गरियाना बेकार है। भाषा का काम कनेक्ट करना है, डिवाइड करना नहीं। ये दौर तो रहेगा परन्तु,बैलेंस जरूरी है। जहाँ प्रोफेशनलिज्म चाहिए, वहाँ भाषा का टोन ठीक रखो। जहाँ अपनापन चाहिए, वहाँ दिल खोलकर हिंग्लिश बोलो क्योंकि आखिर में भाषा वही अच्छी है जो सामने वाले के चेहरे पर स्माइल ले आए। शेक्सपियर ने भी अपने टाइम की बोलचाल वाली इंग्लिश यूज की थी। आज उसे ‘क्लासिक’ कहते हैं। हो सकता है 50 साल बाद हमारी हिंग्लिश भी किसी कोर्स का हिस्सा हो जाये। तब तक, chill मारो और enjoy करो — ये हिंग्लिश का दौर है यार।
हिंग्लिश सिर्फ बोलचाल का तरीका नहीं, अब एक कल्चर बन चुकी है। इस दौर के कुछ और रंग देखो।यह भाषा तो युवाओं की पहचान बन गई है। कॉलेज कैंटीन से लेकर स्टार्टअप ऑफिस तक, हिंग्लिश यूथ की डिफॉल्ट सेटिंग है। “ब्रो, असाइनमेंट सबमिट कर दिया क्या? डेडलाइन तो आज रात 12 बजे है” — इसमें न शुद्ध हिंदी का बोझ है, न अंग्रेजी का प्रेशर। ये भाषा उन्हें कॉन्फिडेंट फील कराती है। टिंडर की बायो हो या लिंक्डिन पोस्ट, हिंग्लिश वाला टोन ही आज की पीढ़ी रिलेट करती है।मार्केटिंग और मीम कल्चर का तो फ्यूल है ये हिंग्लिश…Zomato लिखता है: “आलू ले लो, कांदा ले लो, ऑर्डर भी ले लो”। Swiggy बोलता है: “मूड ऑफ है? ट्रीट योरसेल्फ।” मतलब कि सब ब्रांड जानते हैं कि प्योर हिंदी में Gen-Z बोर हो जाती है, प्योर इंग्लिश में मम्मी-पापा कनेक्ट नहीं करते। हिंग्लिश बीच का रास्ता है — और यही सबसे ज्यादा बिकता है। मीम पेजेज़ तो हिंग्लिश के बिना अधूरे हैं: “जब सैलरी क्रेडिट हो जाए, पर EMI का मैसेज भी आ जाए”।
इसका तो अब एजुकेशन पर भी असर होने लगा है।इस दृष्टि से यह डबल-एज्ड स्वॉर्ड (तलवार की धार)है।बच्चों को कॉन्सेप्ट समझाना आसान हो गया है। फिजिक्स के टीचर बोलते हैं, “Beta, न्यूटन का फर्स्ट लॉ मतलब जड़त्व। जैसे तुम मंडे मॉर्निंग को बेड से नहीं उठते”...और बस,बात तुरंत हिट हो जाती है। लेकिन इसका नुकसान है कि कई स्टूडेंट्स न हिंदी ठीक से लिख पाते हैं, न इंग्लिश। UPSC का निबंध या कंपनी की मेल लिखनी हो तो दिक्कत आती ही है।न शुद्ध अंग्रेजी,न शुद्ध हिन्दी.. कहीं बीच में उलझे से लगते हैं हम।। “मेरे को जाना है” और “I am having a pen” वाली गलती आदत बन जाती है।
अब हिंग्लिश vs शुद्धता की बहस आरंभ होती दिख रही है ।हिंदी के प्रोफेसर कहते हैं: “भाषा का विनाश हो रहा है”। इंग्लिश टीचर बोलते हैं: “Neither here nor there”। बात तो सब सही कह रहे हैं परन्तु,यह भी सच है कि तुलसीदास ने भी तो अवधी में लोकभाषा के शब्द मिक्स किये थे।अंग्रेजी भाषा में भी तो कितने लैटिन-फ्रेंच के शब्द भरे पड़े हैं। भाषा बचाने से नहीं, बोलने से जिंदा रहती है। हिंग्लिश बता रही है कि हिंदी मरी नहीं,एक नये तरीके से इवॉल्व हो रही है।
ग्लोबल लेवल पर भी हिंग्लिश धड़ल्ले से चल रही है।गूगल का कीबोर्ड, एलेक्सा, चैटबॉट्स — सब हिंग्लिश समझते हैं। “Hey Google, पनीर की सब्जी कैसे बनाते हैं?” नेटफ्लिक्स के सबटाइटल में लिखा आता है: “बाप रे, what a twist!” विदेशी भी अब “जुगाड़”,“यार”, “अच्छा” जैसे शब्द सीख रहे हैं। देखा जाए तो, हिंग्लिश इंडिया का सॉफ्ट पावर बनती दिख रही है।
कोर्ट-कचहरी से संसद तक हिंग्लिश फैल रही है।
कोर्ट के जज भी सुनवाई में बोल देते हैं, “आप argue करिए, but to the point”। संसद में नेता कहते हैं, “देश का यूथ demoralize नहीं होना चाहिए”। वकालत में भी अब क्लाइंट को “Relief मिलेगा” की जगह “रिलीफ पक्का है बॉस” ज्यादा समझ आता है।
आखिर में, एक कड़वी-मीठी बात यह है कि
हिंग्लिश न अच्छी है, न बुरी। वो आईना है। वो यह बताती है कि हम दो दुनिया के बीच बैलेंस बनाने की कोशिश कर रहे हैं — रूट्स भी बचाने हैं, और वर्ल्ड से कनेक्ट भी होना है। जरूरी ये है कि हम तय करें कि कब हिंग्लिश, कब हिंदी, कब इंग्लिश.. क्योंकि भाषा का मकसद इम्प्रेस करना नहीं, एक्सप्रेस करना है। और इस दौर में सबसे अच्छे से एक्सप्रेस करती है — हिंग्लिश।
इस भाषा के पक्ष और विपक्ष दोनों ही तरह के तर्क दिए जा सकते हैं।सबसे पहले तो हम यह समझें कि हिंग्लिश का दौर जरूरी क्यों है।
देखा जाए तो, हिंग्लिश द्वारा आज के दौर में व्यवहारिक और असरदार कम्युनिकेशन संभव है। लोगों को हिंग्लिश सबसे फास्ट समझ आती है। “File submit कर देना, वर्ना penalty लग जाएगा” — इसमें हिंदी भाव पकड़ती है, इंग्लिश टेक्निकल टर्म। इसका असर यह है कि ऑफिस, क्लास, घर — हर जगह टाइम बचता है।
दूसरे, यह भाषा का डर खतम करती है। पहले लोग अंग्रेजी न आने पर चुप रहते थे। हिंग्लिश ने कॉन्फिडेंस दिया। अब चायवाला भी बोलता है, “Online payment कर दो न भैया”।इसका असर यह हुआ है कि कम्युनिकेशन डेमोक्रेटिक हुआ है। सबकी आवाज अब सबको समझ आती है।इस दृष्टि से यह भाषा एक कल्चरल ब्रिज भी बनाती है। जैसे,NRI बच्चे दादा-दादी से कहते हैं -“दादी, ये वाला लड्डू too yummy है” ऐसा बोलकर दो पीढ़ियां आपस में कनेक्ट करती हैं। शहर और गाँव की दूरी घटती है। कहने का मतलब है कि हिंदी मर नहीं रही, नए रूप में जिंदा है। इसके अतिरिक्त,यह हिंग्लिश इकॉनोमी और इनोवेशन की भाषा भी साबित हो रही है। स्टार्टअप, रील्स, मीम,ऐड — सब हिंग्लिश से चल रहे हैं। Zomato, Netflix, YouTubers करोड़ों कमा रहे हैं इसी मिक्स भाषा से।हिंग्लिश अब स्किल है, जिससे रोजगार बन रहा है।
भाषा हमेशा बदलती है और समय के साथ यह बदलाव नेचुरल भी है। संस्कृत से प्राकृत, फिर हिंदी बनी। उर्दू-फारसी के शब्दों से हिंदी समृद्ध हुई। आज इंग्लिश से हो रही है। हिंग्लिश को रोकना मतलब नदी का बहाव रोकना।
लेकिन, यदि इसके विपक्ष में सोचें तो हिंग्लिश का दौर खतरनाक सा लगता है।हम न हिंदी के रहे न इंग्लिश के। बच्चे “मेरे को जाना है” और “He don’t know” दोनों लिखते हैं। ग्रामर की बेसिक समझ ही खतम हो रही है। मतलब, UPSC, CAT, विदेश में पढ़ाई — जहाँ शुद्ध भाषा चाहिए, वहाँ फेल। हिंदी की शुद्धता और साहित्य खतरे में आ रहे हैं । नई पीढ़ी प्रेमचंद, निराला पढ़ने में खुद को सहज ही नहीं पाती। “उधरना, बिसूरना, चकल्लस” जैसे शब्द मर रहे हैं।अगर अभी से सचेत नहीं हुए तो पचास साल बाद हमारी भाषाई विरासत सिर्फ मीम में बचेगी। प्रोफेशनल इमेज भी इससे खराब होती है।कोर्ट में जज के सामने “My client को relief मिलना चाहिए, matter genuine है” बोलोगे तो इम्प्रेशन गिरेगा। इसके अतिरिक्त, ग्लोबल मीटिंग, रिसर्च पेपर, लीगल ड्राफ्ट — वहाँ हिंग्लिश चल ही नहीं सकती। फिर,हमारे सोचने की गहराई कम हो रही है। भाषा सिर्फ बोलने के लिए नहीं, सोचने के लिए भी होती है। मिक्स भाषा में गहरी बात बनती ही नहीं। सब “basically, literally” पर अटक जाता है। नतीजा है कि क्रिटिकल थिंकिंग और ओरिजिनल आइडिया कमजोर पड़ रहे हैं।सामाजिक तौर पर देखा जाए तो क्लास डिविजन एक नया रूप ले रहा है। एलीट क्लास की हिंग्लिश स्मार्ट लगती है, मजदूर की हिंग्लिश को “टूटी-फूटी इंग्लिश” बोलकर मजाक उड़ाते हैं।भाषा का भेदभाव खतम नहीं हुआ, बस रूप बदल गया लगता है।
निष्कर्ष के तौर पर कहें तो हिंग्लिश न तो दुश्मन है, न ही भगवान का आशीर्वाद। ये बस वक्त की जरूरत है।हिंग्लिश भाषा की मौत नहीं, कुछ हद तक विकास ही कहा जा सकता है। बस यह बदलाव का दौर दर्शाता है जहां हम सभी एक भाषाई संतुलन बनाने में लगे हैं।हर जिंदा भाषा बदलती है। संस्कृत से हिंदी बनी,फारसी-अरबी के शब्द आए तो हिंदी मरी नहीं, अमीर हुई। आज इंग्लिश के साथ मिलकर वही प्रोसेस चल रहा है। हमें चाहिए कि मकसद से तय हो भाषाई माध्यम। जहाँ दिल से कनेक्ट करना हो, वहाँ हिंग्लिश बेस्ट है। जहाँ दिमाग से इम्प्रेस करना हो — कोर्ट, रिसर्च, ग्लोबल डील — वहाँ शुद्ध हिंदी या इंग्लिश चाहिए। स्मार्ट इंसान वही है जो स्विच करना जानता हो।जड़ मत छोड़ो, पंख फैलाने से डरो भी मत.. हिंदी हमारी जड़ है, पहचान है। इंग्लिश पंख है, उड़ान है। हिंग्लिश वो हवा है जिसमें दोनों साथ उड़ सकते हैं। इसे बैलेंस से यूज करो, अंधाधुंध नहीं। आखिर भाषा का काम दीवार बनाना नहीं, पुल बनाना है। हिंग्लिश आज करोड़ों लोगों के लिए वो पुल जैसी बन रही है। इसे गाली देने से बेहतर है, इसका सही इस्तेमाल सीखना क्योंकि अंत में जीत उसकी नहीं जो सबसे शुद्ध बोलता है, उसकी है जो सबसे साफ समझा पाता है और इस दौर में वो काम हिंग्लिश सबसे अच्छा कर रही है।इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि यही सही है, बल्कि यह तो बस बदलाव की एक प्रक्रिया है।हिंग्लिश को रोकना मतलब बहती नदी पर बांध बनाना है। बांध बनाओगे तो विकास रुक सकती है,खुला छोड़ दें तो भाषाई बाढ़ आएगी और हिंदी भाषा की शुद्धता पर नकारात्मक असर हो सकता है। बेहतर है नहर निकालो — दिशा दे दो,बहाव मत रोको।
© अर्चना अनुप्रिया



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